संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने विश्व सूनामी जागरूकता दिवस के मौके पर अपने संदेश में कहा है कि दिसंबर 2004 में भारतीय महासागर में आई भीषण सूनामी को 15 वर्ष बीत चुके हैं जिसने 14 देशों में दो लाख 30 हजार से भी ज्यादा लोगों की जान ले ली थी।
दुनिया भर में अब तमाम समुद्रों के मिजाज को पहले से भाँपने वाली टैक्नोलॉजी में बेहतरी आई है, जिसके परिणामस्वरूप बहुत सी जानें बचाई जा सकी हैं।
उनका कहना है कि इसके बावजूद खतरा अब भी बहुत बड़ा है। पिछले दो दशकों में बढ़ते आर्थिक नुकसानों से स्पष्ट है कि हमने अभी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में सक्षम बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए पर्याप्त और समुचित सबक सीखने की महत्ता को नहीं पहचाना है।
यूएन प्रमुख ने कहा कि जलवायु संकट के कारण समुद्रों का बढ़ता जल स्तर सूनामी की तबाही क्षमता और ज्यादा बढ़ा सकता है। जबकि ये भी ध्यान में रखने की बात है कि लगभग 68 करोड़ लोग ऐसे समुद्री तटवर्ती इलाकों में रहते हैं जिनका सतही स्तर काफी नीचा है।
जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल की सितंबर 2019 में आई एक रिपोर्ट में विश्व भर में तापमान वृद्धि, जल आपूर्ति में बदलाव और जलवायु संकट की गहनता की तरफ ध्यान दिलाया गया है।
इसी संदर्भ में ये संभावना भी व्यक्त की गई है कि वर्ष 2050 तक समुद्रों के बढ़ते जल स्तर से संबंधित कम से कम एक घटना हर साल होगी।
संयुक्त राष्ट्र की आपदा जोखिम प्रबंधन प्रमुख मामी मिजोतूरी ने सवाल के अंदाज में कहा कि क्या हम किसी ऐसे देश की निशानदेही कर सकते हैं जो किसी तरह के संकट का सामना ना कर रहा हो।
उनका कहना था कि अब पहले के मुकाबले ज्यादा आबादी समुद्री तटवर्ती इलाकों में रह रही है, इसलिए प्राकृतिक आपदाओं के विनाशकारी दस्तक देने से पहले ही उनकी आमद के बारे में जानकारी हासिल करना बहुत जरूरी होगा।
और जब हम विनाशकारी सूनामी की बात करते हैं तो पूर्व चेतावनी वाली प्रणाली बनाना और मजबूत व सहनशील शहरों का निर्माण करना जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचने के उपायों में बहुत जरूरी होगा।