चीन सरकार ने एक नए कानून के साथ पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का मुकाबला करने में अपना हाथ मजबूत करने की कोशिश की है। यह एक तरह से अमेरिका को उसके ही तरीके से जवाब देना है। अमेरिका अकसर अलग-अलग देशों पर प्रतिबंध अपने देश के कानून के तहत लगाता है। ज्यादातर मौकों पर वह ऐसे प्रतिबंध बिना संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर गए एकतरफा ढंग से लगा देता है। अब चीन ने भी उसी रास्ते को अपनाया है।
चीन की संसद से पारित ताजा कानून का मकसद विदेशी प्रतिबंधों से चीन के प्रमुख हितों, उसके कारोबार, और अधिकारियों को संरक्षण देना बताया गया है। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और उसके साथी पश्चिमी देशों ने चीन पर कई प्रतिबंध लगाए हैं। चीन ने भी उस पर जवाबी कार्रवाई की है। लेकिन वे कार्रवाइयां चीन सरकार ने अपने आदेश के तहत कीं। अब ऐसी कार्रवाइयों के लिए वैधानिक आधार तैयार किया गया है।
गुरुवार को चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने ‘एंटी- फॉरेन सैंक्शंस एक्ट’ (विदेशी प्रतिबंध विरोधी अधिनियम) को पास किया। इसके पहले बीते सोमवार को नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति ने इस कानून के लिए तैयार विधेयक को मंजूरी दी थी। कानून के सभी प्रावधानों के ब्योरे को तुरंत सार्वजनिक नहीं किया गया है। लेकिन चीन सरकार की तरफ से कहा गया है कि इस कानून से चीन सरकार को विदेशी प्रतिबंधों के जवाब में दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार मिल गया है। इसके पहले चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा था कि ये कानून बनाने का मकसद ‘राष्ट्रीय संप्रभुता, गरिमा, प्रमुख हितों का संरक्षण और पश्चिमी दादागीरी का विरोध है।’
चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स ने एक टिप्पणी में लिखा है कि इस कानून से चीन सरकार को ‘अवैध विदेशी प्रतिबंधों’ को रोकने का व्यापक वैधानिक आधार मिल गया है। इससे चीन सरकार को पश्चिमी देशों के सामने उनके बराबर रुख अपनाने का आधार मिलेगा और वह जवाबी कदम उठा सकेगी।
अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था के तहत किसी संप्रभु देश के कानून को तब तक मान्यता मिलती है, जब तक वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के कायदों के खिलाफ ना हो। विश्लेषकों के मुताबिक पश्चिमी और चीन विरोधी देश चीन के इस कानून को किस रूप में देखेंगे, ये अभी साफ नहीं है। लेकिन इससे ऐसे घरेलू कानूनों पर जरूर बहस खड़ी होगी, जिनके आधार पर ताकतवर देश बहुपक्षीय मंचों को नजरअंदाज कर कदम उठाते रहे हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि ये कानून बना कर चीन ने ये संदेश देने की कोशिश की है, वह खुद को अब उन्हीं ताकतवर देशों की श्रेणी में देखता है।
इसके पहले भी अमेरिका और चीन ने एक दूसरे के खिलाफ प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय जब चीन से रिश्ते तोड़ने की शुरुआत की गई, तब से ऐसे प्रतिबंधों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने चीन के अधिकारियों और उसके कारोबारी घरानों पर प्रतिबंध लगाए हैँ। जो बाइडेन प्रशासन के सत्ता में आने के बाद भी ये प्रतिबंध कायम रहे हैं।
इस दिशा में अमेरिका सरकार का हाथ मजबूत करने के लिए बीते मंगलवार को अमेरिकी सीनेट ने ‘संयुक्त राज्य आविष्कार और प्रतिस्पर्धा अधिनियम’ पास किया। इसका मकसद अमेरिका को तकनीक क्षेत्र में दुनिया की प्रमुख ताकत बनाए रखना बताया गया है। इसके लिए 250 अरब डॉलर का प्रावधान किया गया है। इस कानून के तहत अमेरिका के सरकारी उपकरणों में टिकटॉक एप डाउनलोड करने पर रोक लगा दी गई है। साथ ही ये प्रावधान किया गया है कि अमेरिकी सरकार चीन में बने ड्रोन नहीं खरीदेगी। अब ऐसे कदमों का जवाब देने की दिशा में चीन भी एक कदम आगे बढ़ा है।