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न्यूनतम कॉरपोरेट टैक्स: धनी देशों के हित में है नई कर व्यवस्था, सरकारों को अरबों डॉलर का लाभ

Mon, 11 Oct 2021 05:44 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

इस समझौते पर 140 देश राजी हो गए हैं। लेकिन बातचीत में शामिल रहने के बाद केन्या, नाईजीरिया, पाकिस्तान, और श्रीलंका ने आखिरी वक्त पर समझौते पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया। इस समझौते का मकसद दुनिया की 100 बड़ी कंपनियों को टैक्स चोरी से रोकना है...
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वैश्विक न्यूनतम कॉर्पोरेट टैक्स - फोटो : Agency
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विस्तार
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वैश्विक न्यूनतम कॉरपोरेट टैक्स के बारे में हुए समझौते का नतीजा यह होगा कि फेसबुक और जॉनसन एंड जॉनसन जैसी हाई टेक और दवा क्षेत्र की कंपनियों को अब हर साल अरबों डॉलर का अधिक टैक्स देना होगा। इस समझौते पर फिलहाल 136 देशों ने दस्तखत किए हैं। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, भारत और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के सदस्य शामिल हैं। समझौते का विवरण पिछले शुक्रवार को जारी किया गया।

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पहले कहा गया था कि इस समझौते पर 140 देश राजी हो गए हैं। लेकिन बातचीत में शामिल रहने के बाद केन्या, नाईजीरिया, पाकिस्तान, और श्रीलंका ने आखिरी वक्त पर समझौते पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया। इस समझौते का मकसद दुनिया की 100 बड़ी कंपनियों को टैक्स चोरी से रोकना है। इन कंपनियों को अब अपनी आमदनी पर न्यूनतम 15 फीसदी टैक्स देना होगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसकी वजह से विभिन्न देशों के खजाने में हर साल अतिरिक्त 150 डॉलर आएंगे। इसके अलावा 125 अरब डॉलर की वसूली भी होगी, जिसे समझौते में शामिल देशों के बीच बांटा जाएगा।

इस समझौते को इसी महीने होने जा रहे जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में पेश किया जाएगा। उन देशों की मंजूरी के बाद इस पर अमल की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। अनुमान है कि इसे लागू करने में दो वर्ष का वक्त लगेगा। जानकारों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कॉरपोरेट टैक्स के ढांचे को नया रूप देने की ऐसी कोशिश दशकों के बाद हुई है। समझौते के लिए बातचीत धनी देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के मंच पर चली।
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ओईसीडी के महासचिव मथायस कॉर्मन ने एक ट्विट में कहा है- ‘नए समझौते के साथ अंतरराष्ट्रीय कर व्यवस्था अधिक उचित और बेहतर हो जाएगी। यह संतुलित बहुपक्षीय पहल की एक बड़ी जीत है।’ उन्होंने कहा कि डिजिटल और वैश्विक स्वरूप ले चुकी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी टैक्स प्रणाली इससे अस्तित्व में आ गई है।

जानकारों ने इसे द्विस्तरीय कर सिस्टम कहा है। इसका मकसद टैक्स हैवेन्स (जहां कर दरें बहुत कम होती हैं) का इस्तेमाल कर कंपनियों को उन देशों को टैक्स राजस्व से वंचित करने से रोकना है, जहां वे कारोबार करती हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये समझौता ज्यादातर पश्चिमी देशों के फायदे में है। जबकि जो छोटे देश अपने यहां टैक्स दर कम करके अब तक लाभ उठाते रहे हैं, उन्हें इससे नुकसान होगा।

थिंक टैंक टैक्स जस्टिस नेटवर्क के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एलेक्स कॉबहैम ने वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू से कहा- ‘इस समझौते से ओईसीडी के सदस्य धनी देशों को ज्यादा लाभ होगा। ज्यादातर नया राजस्व उनके हिस्से में जाएगा। जबकि दूसरे देशों की अपने यहां टैक्स दरें तय करने और अपने टैक्स आधार की रक्षा करने की क्षमता इससे कमजोर पड़ेगी।’

आलोचकों के मुताबिक मौजूदा सिस्टम में सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका और ईयू जैसी अर्थव्यवस्थाओं को होता रहा है। ज्यादातर बड़ी कंपनियां वहीं की हैं। लेकिन वे टैक्स हैवेन्स में अपने मुख्यालय दर्ज करवा कर टैक्स बचाती रही हैं। अब ऐसा करना मुश्किल हो जाएगा।

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