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मोदी और भारतीय दिलों से अमेरिकी राष्ट्रपति पद का रास्ता बना रहे माइक ब्लूमबर्ग

Mon, 30 Dec 2019 02:46 AM IST
संजीव कुमार झा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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माइक ब्लूमबर्ग - फोटो : ट्विटर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीयों के दिलों में पहुंच बनाकर माइक ब्लूमबर्ग अमेरिकी राष्ट्रपति का पद पाने के प्रयास कर रहे हैं। बीते 90 दिनों में भारत में फेसबुक पर सबसे ज्यादा राजनीतिक विज्ञापन डेमोक्रेट प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ना चाह रहे माइक ने अपनी संस्था ब्लूमबर्ग फिलंथ्रोफीस के जरिए दिए।

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इन विज्ञापनों के जरिए न्यूयॉर्क में एक अक्तूबर को ब्लूमबर्ग ग्लोबल बिजनेस फोरम में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माइक के साथ हुई चर्चा को सबसे ज्यादा हाईलाइट किया गया है। फेसबुक की ताजा एड लाइब्रेरी रिपोर्ट में यह रोचक खुलासा हुआ है।

इस वर्ष 29 सितंबर से 27 दिसंबर यानी बीते 90 दिनों में फेसबुक पर दिए गए विज्ञापनों पर यह रिपोर्ट है। माना जा रहा है कि अमेरिका में मौजूद भारतवंशी सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के भारत में रह रहे परिवारों बीच अपनी पहचान बनाने और खुद को प्रमोट करने के लिए ऐसा किया गया है।
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माइक ब्लूमबर्ग फिलंथ्रोफीस के सीईओ व संस्थापक भी हैं। उन्हीं के नाम से बने फेसबुक पेज के नाम पर यह विज्ञापन दिए गए। कुल 10 विज्ञापन दिए गए, जिन पर 37.39 लाख रुपये खर्च हुए। खास बात है कि उनके बाद दूसरे स्थान पर एक न्यूज मोबाइल एप रहा, जिसने अपने प्रमोशन पर माइक से 10 लाख रुपये कम खर्च किए। ब्लूमबर्ग फिलंथ्रोफीस फरवरी से अब तक 53.79 लाख रुपये फेसबुक विज्ञापनों पर खर्च कर चुकी है।

माइक के विज्ञापन : 10 में से आठ में मोदी

इन 10 में से आठ विज्ञापनों में पीएम मोदी द्वारा ब्लूमबर्ग फोरम में दिए गए वक्तव्य, अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा, आदि विषयों पर चर्चा के दौरान बनाए वीडियो व तस्वीरों के फेसबुक पोस्ट हैं। बाकी में फोरम के उद्घाटन की पोस्ट हैं।

25 से 34 वर्ष टारगेट ग्रुप

फेसबुक ने इन विज्ञापनों को सबसे ज्यादा 57 प्रतिशत दफा 24 से 34 वर्ष के युवा लड़कों को परोसा गया। इसी उम्र की लड़कियों को यह केवल नौ प्रतिशत गया, जो विज्ञापनों भेजने में बरते गए लैंगिक भेदभाव को दर्शाता है।

यह भी माना गया है कि नरेंद्र मोदी की इस आयु वर्ग में लोकप्रियता का सहारा लेकर माइक भी खुद को प्रोजेक्ट कर पाएंगे। इसी आयु वर्ग से कई युवा अमेरिका में कॅरियर विकल्प या ऑनसाइट अवसर तलाशते हैं।

बाकी विज्ञापन : शिवसेना तीसरे नंबर पर

दूसरे नंबर पर रहे न्यूज एप केे अलावा बाकी प्रमुख फेसबुक विज्ञापनदाता राजनीतिक दल रहे। इनमें शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस के ‘दीदी के बोलो’ व ‘आमार गोर्बो ममता’ अभियान के विज्ञापन प्रशांत किशोर की बनाई इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी ने दिए।

चुनाव में विपक्षी दल की छवि सोशल मीडिया पर बिगाड़ने में भी काफी पैसा खर्च किया गया, एनसीपी-कांग्रेस की आलोचना करते पेज ‘अघाड़ी बिघाड़ी’ ने सात लाख रुपये से ज्यादा खुद को प्रमोट करने में लगा दिए।
 
दल/संस्था अभियान खर्च कुल विज्ञापन
शिवसेना  19.83 लाख 117
झारखंड कांग्रेस 14.13 लाख 372
दीदी के बोलो 13.09 लाख 320
फिर एक बार, ईमानदार सरकार (हरियाणा भाजपा) 11.90 लाख 688
दिस्तोए फरक, शिवशाही परत (महाराष्ट्र भाजपा) 10.83 लाख 99
आमार गोर्बो ममता 9.78 लाख 167
आरके सिन्हा (भाजपा राज्यसभा सांसद) 9.47 लाख 419
कांग्रेस महाराष्ट्र 8 लाख 13
अघाड़ी बिघाड़ी 7.36 लाख 364
भाजपा महाराष्ट्र 7.09 लाख 80






 
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विवादों से बचने के लिए सब रोक रहे राजनीतिक विज्ञापन, बस फेसबुक नहीं मान रहा

  • हाल में कई सोशल मीडिया वेबसाइट्स और अन्य प्लेटफॉर्म ने विवादों से बचने के लिए राजनीतिक विज्ञापनों पर अपने यहां रोक लगाई है।
  • नवंबर में सबसे बड़े इंटरनेट सर्च इंजन गूगल ने यूजर्स की राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप उन्हें विज्ञापन भेजने से राजनीतिक विज्ञापनदाताओं को रोकने की घोषणा की थी।
  • बीते शुक्रवार म्यूजिक स्ट्रीम करने वाली कंपनी स्पॉटीफाई ने 2020 से राजनीतिक विज्ञापनाें पर पूरी तरह रोक लगाने की घोषणा की है।
  • ट्विटर ने भी यूजर्स को टारगेट करके राजनीति विज्ञापन भेजने पर रोक लगाने की घोषणा अक्तूबर में की थी।
  • लेकिन दो दिसंबर को फेसबुक ने विवादित, फर्जी या असली, किसी भी तरह राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक न लगाने की नीति जारी करते हुए कहा था आम लोगों को ही राजनीतिक लोगों पर निर्णय करने देना चाहिए।
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