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ताकतवर उल्का पिंड के टकराने से खत्म हुए डायनासोर!

वर्ल्ड डेस्क, ऑस्टिन Published by: Priyesh Mishra Updated Sat, 14 Sep 2019 06:15 PM IST

सार

  • क्रिटेशियस काल तक अस्तित्व में रहे डायनासोर के विलुप्त होने को लेकर कई शोध हुए हैं।
  • टैक्सास विवि का ताजा शोध यह कहता है कि किसी ताकतवर उल्कापिंड के टकराने से यह खत्म हुए।
  • अभी तक के अध्ययन के अनुसार डायनासोर केवल मुंह बंद करके गुर्रा सकते थे। उनको दहाड़ना नहीं आता था।
  • 45 मीटर तक लंबी होती थी डायनासोर की पूंछ, जो भागते वक्त उनका बैलेंस बेहतर बनाती थी।
  • 07 करोड़ साल पुराना है डायनासोर का जीवाश्म, जो हमारे देश गुजरात में नर्मदा नदी के पास मिला है।
  • 6.5 करोड़ साल पहले खत्म हो गया था वैज्ञानिकों के अनुसार डायनासोर का अस्तित्व।
  • 16 करोड़ साल तक पृथ्वी पर जिंदा रहे थे डायनासोर। जिस काल में ये जीवित थे उसे मेसोजोइक कहा जाता है।
  • 1842 में ब्रिटिश वैज्ञानिक रिचर्ड ओवेन ने सबसे पहले इस बड़ी छिपकली को डायनासोर नाम दिया था।
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डायनासोर - फोटो : Social media
डायनासोर के खत्म होने को लेकर उल्का के पृथ्वी से टकराने की थ्योरी के बारे में ऑस्टिन टैक्सास विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कुछ नए खुलासे किए हैं। उनका दावा है कि करीब 81 किमी बड़े आकार की उल्का पृथ्वी पर जिस जगह टकराई थी, वह मौजूदा समय में मैक्सिको के निकट है। इसने द्वितीय विश्व युद्ध में उपयोग किए गए परमाणु बमों जैसे 1000 करोड़ बमों के बराबर ताकत से पृथ्वी को टक्कर मारी थी।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी वजह से हजारों किमी. क्षेत्र में आग लग गई थी। साथ ही सुनामी पैदा हुई, जिसकी सैकड़ों मीटर ऊंची लहरें अमेरिका के मौजूदा इलिनॉयस तक पहुंच गई थी। इसमें पृथ्वी पर मौजूद 75 प्रतिशत जीव खत्म हो गए थे, जिनमें डायनासोर प्रमुख थे। इलिनॉयस आज समुद्र तट से करीब 750 किमी दूर है।


वैज्ञानिकों के अनुसार टकराव स्थल समुद्र सतह से 500 से 1300 मीटर की गहराई पर है। इसकी वजह से मैक्सिको की खाड़ी में एक बड़ा क्रेटर बना। इस क्रेटर में विस्फोट के तुरंत बाद भारी मात्रा में कोयला, मिट्टी व विस्फोट से फैले अन्य तत्व जमा होते गए। इसी वजह से यहां टकराव और विस्फोट के हालात की जानकारी देने वाले तत्व मिल रहे हैं।

यह हुआ था टकराव के बाद

उल्का के टकराव के बाद करीब 32500 करोड़ टन तत्व पृथ्वी के वातावरण में बिखर गए। इससे वातावरण नष्ट हुआ व सूर्य की किरणें लंबे समय के लिए पृथ्वी पर आने से रुक गईं। इससे तापमान में भारी गिरावट आई। डायनासोर जैसे बड़े जीव खत्म हो गए। एक अन्य शोध के अनुसार जीव वैज्ञानिकों को अभी तक मिले जीवाश्मों से डायनासोर की 1000 हजार से अधिक प्रजातियों का पता चला है। अब तक खोजे गए डायनासोरों के जीवाश्मों में से सबसे बड़ा डायनासोर जीवाश्म अमेरिका के व्योमिंग राज्य में मिला था। इस जीवाश्म की लंबाई 27 मीटर है। डायनासोर के कंकाल दुनिया के हर कोने में मिले हैं। उस काल में मांसाहारी और शाकाहारी दोनों तरह के डायनासोर अस्तित्व में थे।

10 मीटर का क्रायोड्रेकन था धरती पर उड़ने वाला सबसे बड़ा जीव

अपने डैनों के 10 मीटर विस्तार के साथ क्रायोड्रेकॉन बोरियस हमारी पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे बड़े जीवों में से एक था।  करीब 30 वर्ष पूर्व कनाडा के अल्बर्टा में मिले अवशेषों के आधार पर क्वीन मैरी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है। इस बारे में उनकी रिपोर्ट जर्नल ऑफ वर्टिब्रेट पेलियनटॉलोजी के सितंबर के अंक में प्रकाशित की गई है। अवशेषों की खोज के बाद माना जा रहा था कि क्रायोड्रेकॉन अमेरिका के टेक्सास में पहले खोजी गई टेरोसोर प्रजाति का एक डानयासोर है।

ताजा अध्ययन रिपोर्ट में इसे अलग जीव घोषित किया गया है। अध्ययनकर्ता डॉ डेविड होन और माइकल हबीब के मुताबिक यह एक बड़ी खोज है। ऐसी संभावनाएं जताई गई थीं कि इतने बड़े उड़ने वाले जीव पृथ्वी पर कभी रहे होंगे, लेकिन अब यह पुख्ता तौर पर कहा जा सकता है। 

अल्बर्टा में मिले अवशेष

यह पृथ्वी के आसमान में करीब 7.7 करोड़ वर्ष पूर्व राज करता था। अल्बर्टा में इस जीव के पांव, पंख, गर्दन और पसलियों के अवशेष मिले थे। यह युवा क्रोयोड्रेकॉन था, जिसके पंखों का विस्तार लगभग 5 मीटर था। एक वयस्क क्रायोड्रेकॉन की विशाल गर्दन के अवशेष भी मिले, उसके पंखों का आकार 10 मीटर आंका गया।

7.7 करोड़ वर्ष पूर्व आसमान में करता था राज

अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, क्रायोड्रेकॉन मांसाहारी था। इसका शिकार स्तनधारी, अन्य छोटे डायनासोर के बच्चे और सरीसृप थे। यह आसमान से उन पर हमला करता था। बाकी जीवों में उस भय की कल्पना की जा सकती है, जब आसमान से क्रायोड्रेकॉन का हमला होता था। यह भी अनुमान है कि वे उड़कर महासागर पार करने की क्षमता रखते थे।
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डायनासोर - फोटो : Social media
डायनासोर के खत्म होने को लेकर उल्का के पृथ्वी से टकराने की थ्योरी के बारे में ऑस्टिन टैक्सास विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कुछ नए खुलासे किए हैं। उनका दावा है कि करीब 81 किमी बड़े आकार की उल्का पृथ्वी पर जिस जगह टकराई थी, वह मौजूदा समय में मैक्सिको के निकट है। इसने द्वितीय विश्व युद्ध में उपयोग किए गए परमाणु बमों जैसे 1000 करोड़ बमों के बराबर ताकत से पृथ्वी को टक्कर मारी थी।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी वजह से हजारों किमी. क्षेत्र में आग लग गई थी। साथ ही सुनामी पैदा हुई, जिसकी सैकड़ों मीटर ऊंची लहरें अमेरिका के मौजूदा इलिनॉयस तक पहुंच गई थी। इसमें पृथ्वी पर मौजूद 75 प्रतिशत जीव खत्म हो गए थे, जिनमें डायनासोर प्रमुख थे। इलिनॉयस आज समुद्र तट से करीब 750 किमी दूर है।

वैज्ञानिकों के अनुसार टकराव स्थल समुद्र सतह से 500 से 1300 मीटर की गहराई पर है। इसकी वजह से मैक्सिको की खाड़ी में एक बड़ा क्रेटर बना। इस क्रेटर में विस्फोट के तुरंत बाद भारी मात्रा में कोयला, मिट्टी व विस्फोट से फैले अन्य तत्व जमा होते गए। इसी वजह से यहां टकराव और विस्फोट के हालात की जानकारी देने वाले तत्व मिल रहे हैं।

यह हुआ था टकराव के बाद

उल्का के टकराव के बाद करीब 32500 करोड़ टन तत्व पृथ्वी के वातावरण में बिखर गए। इससे वातावरण नष्ट हुआ व सूर्य की किरणें लंबे समय के लिए पृथ्वी पर आने से रुक गईं। इससे तापमान में भारी गिरावट आई। डायनासोर जैसे बड़े जीव खत्म हो गए। एक अन्य शोध के अनुसार जीव वैज्ञानिकों को अभी तक मिले जीवाश्मों से डायनासोर की 1000 हजार से अधिक प्रजातियों का पता चला है। अब तक खोजे गए डायनासोरों के जीवाश्मों में से सबसे बड़ा डायनासोर जीवाश्म अमेरिका के व्योमिंग राज्य में मिला था। इस जीवाश्म की लंबाई 27 मीटर है। डायनासोर के कंकाल दुनिया के हर कोने में मिले हैं। उस काल में मांसाहारी और शाकाहारी दोनों तरह के डायनासोर अस्तित्व में थे।

10 मीटर का क्रायोड्रेकन था धरती पर उड़ने वाला सबसे बड़ा जीव

अपने डैनों के 10 मीटर विस्तार के साथ क्रायोड्रेकॉन बोरियस हमारी पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे बड़े जीवों में से एक था।  करीब 30 वर्ष पूर्व कनाडा के अल्बर्टा में मिले अवशेषों के आधार पर क्वीन मैरी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है। इस बारे में उनकी रिपोर्ट जर्नल ऑफ वर्टिब्रेट पेलियनटॉलोजी के सितंबर के अंक में प्रकाशित की गई है। अवशेषों की खोज के बाद माना जा रहा था कि क्रायोड्रेकॉन अमेरिका के टेक्सास में पहले खोजी गई टेरोसोर प्रजाति का एक डानयासोर है।

ताजा अध्ययन रिपोर्ट में इसे अलग जीव घोषित किया गया है। अध्ययनकर्ता डॉ डेविड होन और माइकल हबीब के मुताबिक यह एक बड़ी खोज है। ऐसी संभावनाएं जताई गई थीं कि इतने बड़े उड़ने वाले जीव पृथ्वी पर कभी रहे होंगे, लेकिन अब यह पुख्ता तौर पर कहा जा सकता है। 

अल्बर्टा में मिले अवशेष

यह पृथ्वी के आसमान में करीब 7.7 करोड़ वर्ष पूर्व राज करता था। अल्बर्टा में इस जीव के पांव, पंख, गर्दन और पसलियों के अवशेष मिले थे। यह युवा क्रोयोड्रेकॉन था, जिसके पंखों का विस्तार लगभग 5 मीटर था। एक वयस्क क्रायोड्रेकॉन की विशाल गर्दन के अवशेष भी मिले, उसके पंखों का आकार 10 मीटर आंका गया।

7.7 करोड़ वर्ष पूर्व आसमान में करता था राज

अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, क्रायोड्रेकॉन मांसाहारी था। इसका शिकार स्तनधारी, अन्य छोटे डायनासोर के बच्चे और सरीसृप थे। यह आसमान से उन पर हमला करता था। बाकी जीवों में उस भय की कल्पना की जा सकती है, जब आसमान से क्रायोड्रेकॉन का हमला होता था। यह भी अनुमान है कि वे उड़कर महासागर पार करने की क्षमता रखते थे।

ये प्राणी भी हैं विलुप्ति की कगार पर

डायनासोर के विलुप्त होेने पर जहां बड़ी-बड़ी रिसर्च हो रही हैं। वहीं आज के समय में भी कुछ ऐसे प्राणी हैं, जिन्हें आज संरक्षित नहीं किया गया तो वे भी विलुप्त हो सकते हैं।

उत्तरी सफेद राइनो

इस प्रजाति का आखिरी नर सूडान भी कुछ समय पहले मर गया। विलुप्त हो चुकी इस प्रजाति को अब भी वैज्ञानिक आईवीएफ तकनीक के जरिए फिर से वापस लाने की कोशिशों में लगे हैं। वहीं बाकी ने मान लिया है कि हमने इन्हें हमेशा हमेशा के लिए खो दिया।

दक्षिण चीनी बाघ

बाघों की सभी प्रजातियों में यह सबसे ज्यादा खतरे में हैं। सन 1970 से ही एक भी दक्षिण चीनी बाघ प्राकृतिक माहौल में नहीं दिखा है। कब्जे में रखे गए ऐसे बाघ भी संख्या में 80 से कम ही हैं. इन्हें भी एक तरह से खत्म मान ही लिया गया है।

आमूर तेंदुआ

प्रकृति में ऐसे 80 से भी कम तेंदुए रहते हैं। इस तरह यह हमारी पृथ्वी पर पाई जाने वाली सबसे दुर्लभ बड़ी बिल्लियों में से एक हैं। दक्षिणी चीन, उत्तरी रूस और कोरियाई प्रायद्वीप के जंगलों में इसका प्राकृति आवास रहा है। इसे सबसे बड़ा खतरा शिकार और घटते जंगलों से है।

रेड वूल्फ

दुनिया में केवल 30 लाल भेड़िए ही बचे हैं। रेड वुल्फ को गंभीर रूप से खतरे में पड़ी प्रजाति माना जाता है और इसे बचाने के काफी प्रयास जारी हैं। यह ग्रे वुल्फ और कायोटे के बीच का एक आनुवंशिक मिश्रण है। 1960 के दशक में चलाए गए एक अभियान से इन्हें काफी नुकसान पहुंचा। अब यह केवल उत्तरी कैरोलाइना में ही बचे हैं।

वाक्विता या खाड़ी सूंस

खाड़ी सूंस के नाम से लोकप्रिय वाक्विता दुनिया की सबसे दुर्लभ समुद्री जीव है। इस समय शायद ऐसी केवल 15 मछलियां ही बची हों। हालांकि इसका कभी भी सीधे शिकार नहीं किया गया, लेकिन कैलिफोर्निया के खाड़ी इलाके में एक दूसरी मछली टोटोआबा को पकड़ने के लिए डाले जाने वाले जालों में यह अक्सर खुद ही फंस जाया करती है।

पूर्वी गोरिल्ला

धरती पर जिंदा बचा सबसे बड़ा प्राइमेट अब अवैध शिकार और जंगलों के कटने के कारण खुद खतरे में है। गोरिल्ला की यह उपजाति आबादी में कुल 3,800 के आसपास बची है। इनकी आबादी को स्थाई बनाने में अब भी काफी प्रयास किए जाने बाकी हैं।
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