जापानी विश्लेषकों का आरोप है कि सुगा, टोक्यो के पूर्व गवर्नर शिनतारो इशिहारा, और ओलंपिक खेल आयोजन समिति के पूर्व अध्यक्ष योशिरो मोरी 1964 में टोक्यो में ओलंपिक खेलों के हुए सफल आयोजन से बेहद प्रभावित थे। उनकी सोच थी कि उसी करिश्मे को फिर से दोहराया जा सकेगा। 1964 के ओलंपिक खेलों के जरिए जापान दुनिया को अपनी आर्थिक और तकनीकी ताकत दिखाने में सफल रहा था। उन खेलों के बाद दुनिया में जापान की हैसियत बढ़ी थी। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। फिलहाल अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है। उधर देश आबादी की औसत उम्र बढ़ने के साथ कामकाजी लोगों की कमी की समस्या का सामना कर रहा है।
योशिमी ने कहा- आज की हकीकत यह है कि अब देश में पहले जैसी शानदार आर्थिक वृद्धि का दौर नहीं लौटेगा। इसलिए नेताओं को चाहिए कि अतीत के गौरव मोह में फंसे रहने के बजाय वे अपने सोचने का तरीका बदलेँ। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जापान के लोगों की सबसे पहली प्राथमिकता महामारी से निपटना है। ओलंपिक खेलों ने देश में कोरोना संक्रमण के मामलों को बढ़ा दिया। उधर टीकाकरण की रफ्तार अब तेजी हुई है, लेकिन अभी भी कुल टीकाकरण निम्न स्तर पर ही है।
विश्लेषकों के मुताबिक बीते एक दशक में जापान के लोग गिरती आर्थिक वृद्धि दर, 2011 में आई सुनामी और उसकी वजह से फुकुशिया में हुए परमाणु हादसे से बने हालात के साये में जीते रहे हैं। ऊपर से कोरोना महामारी की मार पड़ी। ऐसे माहौल में वे ओलंपिक जैसे आयोजन के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। जानकारों का कहना है कि लोगों की इस सोच की अनदेखी करते हुए देश के नेताओं ने भव्य आयोजन का दांव चला। जो नाकाम रहा है। अब उनके सामने लोगों का भरोसा जीतने की चुनौती है।