विश्लेषकों का कहना है कि शिन्जो आबे की नीतियों पर निशाना साध कर फुमियो किशिदा एक नपा-तुला जोखिम उठा रहे हैं। फिलहाल, जनमत सर्वेक्षणों में उनकी अप्रूवल रेटिंग 50 फीसदी से कुछ ही अधिक है। लोकप्रियता के इसी स्तर के साथ वे चुनाव मैदान में उतरे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक अपनी नई घोषणाओं से किशिदा मतदाताओं को संदेश देना चाहते हैं कि उनके शासनकाल में उन्हें नया दौर देखने को मिलेगा।
लेकिन पर्यवेक्षकों की राय है कि किशिदा जो कह रहे हैं, उसे अमल में लाना आसान नहीं है। प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के पहले हफ्ते में ही उन्हें अपनी एक प्रमुख घोषणा वापस लेनी पड़ी। उन्होंने पूंजीगत लाभ टैक्स बढ़ाने की घोषणा की थी। लेकिन उससे जापान के शेयर बाजारों में भारी गिरावट आई। उसके बाद उन्होंने अपने इस एलान को वापस ले लिया।
किशिदा ने कर्मचारियों के तनख्वाह बढ़ाने वाली कंपनियों को टैक्स रियायत देने, नर्सों और आम देखभाल करने वाले कर्मचारियों (केयर वर्कर्स) के वेतन बढ़ाने और आर्थिक लाभ के ट्रिकल डाउन सिद्धांत को पलटने के वादे किए हैं। इसके साथ ही उन्होंने सरकार और प्राइवेट सेक्टर के बीच सहयोग बढ़ाने की बात कही है, ताकि जापान को चिप जैसे उत्पादों और रेयर अर्थ जैसे पदार्थों के मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सके।