चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दुनिया में इतनी धौंस दिखा रहे हैं। हाल में, अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुलविन चीन में थे और इधर चीन और अमेरिका के बीच में तल्खी घटने के संकेत मिल रहे। अमेरिका चीन को भड़काने वाला कोई कदम नहीं उठा रहा है। उसके भीतर आ रहे बदलाव पर भारत की पैनी निगाह है। दूसरी तरफ चीन और भारत के संबंध अभी भी सामान्य नहीं हैं।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल भी कहते हैं कि भारत और चीन के संबंध सामान्य नहीं है। विदेश मंत्री जयशंकर ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार भारत और चीन के बीच में संबंध को असामान्य बताने के साथ उसे नसीहत, सुझाव सब दिए हैं। हालांकि, संबंधों के पटरी पर आने को लेकर विदेश मंत्रालय के अधिकारी अभी कुछ स्पष्ट बता पाने की स्थति में नहीं है।
हिन्द महासागरीय क्षेत्र में घूम रहे हैं चीन के युद्धपोत
भारत और चीन के बीच में सामरिक और रणनीतिक मामले को लेकर एक गजब की प्रतिस्पर्धा चल रही है। चीन ने श्रीलंका के तमें अपना जासूसी जहाज भेजा था, लेकिन भारत के विरोध के बाद श्रीलंका ने उसे अपने यहां नहीं टिकने दिया। अब यह पोत मालदीव के तट पर पहुंच चुका है। जवाब में सुरक्षा को अहम मानते हुए भारत ने श्रीलंका के तटों के पास पनडुब्बी को तैनात किया है। चीन डोकलाम के पास भूटान से मसले हल करने के लिए बातचीत कर रहा है। पाकिस्तान में चीन का दखल साफ देखा जा सकता है। चीन उसे पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान दे रहा है। हाल में उसने पाकिस्तान 054ए(पी) टाइप के चार फ्रिगेट दिए। चीन और पाक की नौसेना ने उच्चस्तरीय युद्धाभ्यास किया और करांची में 039 टाइप की उसकी पनडुब्बी ने डेरा डाल रखा है।
भारतीय नौसेना के सूत्र बताते हैं कि हिन्द महासागरीय क्षेत्र में चीन की गतिविधियां काफी तेजी से चल रही हैं। भारत के लिए चिंता की बात हार्न ऑफ अफ्रीका के पास जिबूती में चीनी नौसैनिक बेस की मौजूदगी है। इसके अलावा मालदीव में इस समय चीन का प्रभाव काफी बढ़ गया है। राष्ट्रपति मोइज्जू की सरकार चीन के इशारे पर काम कर रही है। भारत से उसने अपने सैनिकों को वापस बुलाने के लिए कहा है। विदेश और रक्षा मंत्रालय के अधिकारी इस तरह के तमाम सवालों पर कोई जवाब नहीं देना चाहते। उनका कहना है कि भारत और चीन के बीच में कई फोरम पर चर्चा चल रही है। इससे अधिक उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है।
बात लद्दाख क्षेत्र में तनाव और चीन के अजगरी स्वभाव की
अप्रैल 2020 में लद्दाख चीन के सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा(एलएसी) को पार किया और भारतीय क्षेत्र में घुस आए। जून महीने में दोनों देशों के सैनिकों के बीच में हिंसक झड़प हुई और इस झड़प ने न केवल भारत को बल्कि दुनिया के तमाम देशों को हैरान कर दिया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इसके लिए लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच से चीन के ऊपर अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। दोनों देशों के बीच में बफर जोन को लेकर भी सहमति बनी, लेकिन चीन ने बाद में भारत से बनी सहमतियों को लागू करने में कोई रुचि नहीं दिखाई। दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच में 19 दौर की बातचीत भी हो चुकी है, लेकिन नतीजे में कोई खास बदलाव नहीं आया।
इस बीच, बफर जोन में आने के कारण रजांग लॉ में स्थित मेजर शैतान सिंह के स्मारक को भी तोड़ दिया गया। मेजर शैतान सिंह की शहादत रजांग लॉ में ही 1962 के युद्ध में हुई थी। वह बड़ी वीरता के साथ लड़े थे और चीनी सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए थे। भारतीय सैनिक सीमा क्षेत्र में इस स्मारक से प्रेरणा पाते थे। यह दिलचस्प है कि सीमावर्ती क्षेत्र में भारत ने चीनी घुसपैठ को रोकने और अपने भू-भाग की रक्षा के लिए 2020 से ही 50000 से अधिक सैनिक तैनात कर रखे हैं। दूसरी तरफ चीन इस क्षेत्र वास्तविक नियंत्रण रेखा(एलएसी), अंतरराष्ट्रीय नियम और शर्तें तथा भारत के साथ बनी द्विपक्षीय सहमति को मानने में रुचि नहीं दिखा रहा है।
आखिर भारत के पास अपने हक की रक्षा के लिए विकल्प क्या है?
भारत ने करीब-करीब सभी विकल्प अपना लिए हैं। ब्रिक्स 2023 की शिखर बैठक(जोहांसबर्ग) के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति नरेन्द्र मोदी मिले थे। शांति प्रक्रिया की बहाली की दिशा में कुछ सहमति बनी थी, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं आया है। चीन चाहता है कि भारत और चीन के बीच में व्यवसायिक, कारोबारी रिश्ते पहले की तरह आरंभ हों, लेकिन वह लद्दाख के सीमा क्षेत्र में 2020 में पैदा हुए विवाद की दिशा में कोई कदम नहीं उठा रहा है। चीन इस मुद्दे पर टाल मटोल की मुद्रा में हैं। जबकि भारत चाहता है कि विश्वास बहाली जरूरी है। इसके लिए शांति वार्ता प्रक्रिया के चरणों पर अमल आवश्यक है। इसलिए चीन को चाहिए कि पहले सीमा पर शांति की बहाली होनी चाहिए। बिना शांति बहाली के दोनों देशों के बीच में व्यवसायिक, कारोबारी रिश्ते पर वार्ता मुश्किल है।
दरअसल, अभी तक भारत का चीन से आयात अधिक था। निर्यात कम। भारत ने 2020 के बाद से चीन से निर्यात की निर्भरता घटाई है। चीन की कंपनियों से टैक्स लेने, तकनीकी के व्यापार आदि को भी स्कैनिंग और शर्तों के दायरे में लाया है। चीन कंपनियों के भारत में व्यापार और आर्थिक लेन-देन को लेकर भी भारत ने कई बड़े फैसले लिए हैं। चीन के 300-350 एप पर भी प्रतिबंध लगाया है। अभी भारत और चीन के बीच दवा, ऊर्जा क्षेत्र, तकीनीकी उपकरण, मोबाइल फोन आदि का कारोबार होता है। चीन की कंपनियों को भारत में काफी बड़े अवसर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन भारत की पहली कोशिश सीमा क्षेत्र में शांति बहाली है। जबकि चीन इसे लेकर बहुत गंभीर नहीं दिखाई देता।
क्वॉड को लेकर आखिर अमेरिका क्यों चल रहा है इतनी सुस्त चाल
विदेश मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार कहते हैं कि क्वाॉड(अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया) का गठन चीन की हेकड़ी ढीली करने के लिए हुआ था। अभी इसकी ड्राइविंग सीट पर भारत है, लेकिन पीछे से रिमोट अमेरिका के हाथ में है। रंजीत कहते हैं कि जनवरी 2024 में क्वॉड की शिखर नेताओं की बैठक(सम्मेलन) होनी थी। लेकिन अभी इस पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। दरअसल, क्वॉड के गठन में सबसे बड़ी भूमिका की है। क्वॉड को लेकर सबसे अधिक रूचि जापान की है। जापान के बाद भारत आता है। इसमें आस्ट्रेलिया का कोई भी हित जापान और भारत के बाद आता है।
माना जा रहा है कि अमेरिका अब धीरे-धीरे अपने हितों को देखते हुए चीन को बहुत छेडऩे के मूड में नहीं है। इसलिए क्वॉड सम्मेलन की तारीख तय नहीं हो पा रही है। अमेरिका इसके लिए अपने देश में राष्ट्पति पद का चुनावी साल होने का भी हवाला दे रहा है। जबकि विदेश मामलों के जानकार इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदल रही भू-राजनीतिक परिस्थिति को भी जिम्मेदार मानते हैं। अमेरिका के कारण यह स्थिति आस्ट्रेलिया की भी बन रही है। इस स्थिति में चाहकर भी भारत और जापान क्वॉड के सम्मेलन के जरिए चीन पर नैतिक दबाव बना पाने के अवसर से वंचित हैं।