अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम का सबसे बुरा असर ईरान पर पड़ रहा है। दरअसल, अफगानिस्तान के कई इलाके ईरान से सटे हुए हैं। जैसे-जैसे तालिबान अफगानिस्तान के इलाकों पर कब्जा कर रहा है, शरणार्थियों का रेला ईरान की सीमा में घुसने लगा है। अब आलम यह है कि रोजाना सैकड़ों शरणार्थी ईरान में शरण ले रहे हैं। इसमें शिया मुसलमानों की संख्या काफी ज्यादा है।
गौरतलब है कि ईरान में अफगान शरणार्थी पहले से बड़ी संख्या में हैं। ईरान उन लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराता है। इसका बहुत भारी बोझ ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। हालांकि, ईरान ने हमेशा अफगानिस्तान से विदेशी फौज की वापसी की वकालत की, लेकिन पर्यवेक्षकों के मुताबिक, अब उसे अहसास हो रहा है कि उन सेनाओं का वहां रहना और तालिबान को काबू में रखना ईरान के भी हित में था।
बता दें कि तालिबान अफगानिस्तान में अपना शासन कायम करने पर अड़ा हुआ है। वहीं, ईरान अफगानिस्तान में सिर्फ सुन्नी मुसलमानों का राज कायम होने के खिलाफ है। उसकी राय है कि किसी अफगानिस्तान सरकार में शियाओं को भी वाजिब नुमाइंदगी मिलनी चाहिए। इसी मकसद से ईरान ने तालिबान के साथ संवाद बना रखा है।
जब 20 साल पहले तालिबान का शासन था, तब अफगानिस्तान नशीले पदार्थों की तस्करी का केंद्र बन गया था। तालिबान समर्थित तस्करों ने पश्चिमी देशों तक ड्रग्स पहुंचाने के लिए ईरान का इस्तेमाल रास्ते के रूप में किया था। इसका असर ईरान पर भी पड़ा था। ईरान वैसी स्थिति दोबारा बनने को लेकर भी चिंतित है। ऐसे में अफगानिस्तान में तेजी से बदल रहे हालात और उस पर हो रही अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया पर उसकी बारीक नजर बनी हुई है।
ईरान सरकार के अधिकारियों ने वॉशिंगटन से आई इस खबर को गंभीरता से लिया कि अमेरिका को काबुल स्थित अपना दूतावास बंद करना पड़ सकता है। दरअसल, अमेरिका में खास चिंता हेलमांद प्रांत पर तालिबान के कब्जे के बाद बढ़ी। हेलमांद में वर्षों तक अमेरिकी और नाटो सेना की तालिबान से लड़ाई चली। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का आकलन था कि वहां तालिबान की जड़ें कमजोर कर दी गईं, लेकिन तालिबान ने वहां जितनी आसानी से कब्जा किया, उससे पूरे अफगानिस्तान के बारे में अपने आकलन पर अमेरिकी अधिकारियों को पुनर्विचार करना पड़ा है।
अमेरिकी अधिकारियों का आकलन था कि अफगान फौज तालिबान का मुकाबला करने में सक्षम है। उससे पास बेहतर तकनीक और हथियार मौजूद हैं। अब अमेरिकी अधिकारियों ने मीडिया से बातचीत में यह स्वीकार किया है कि उनका आकलन गलत निकला। उनके मुताबिक ऐसा लगता लगता है कि युद्ध होने से पहले ही अफगान सैनिक मनोवैज्ञानिक रूप से हार मान चुके थे।
ईरान के अधिकारी भी अमेरिका के इस आकलन से सहमत है। ऐसे में तालिबान के हाथ अफगानिस्तान की कमान आना वे तय मानकर चल रहे हैं। हालांकि, उन्होंने इस मसले पर गंभीर विचार-विमर्श शुरू कर दिया कि इन हालात से पैदा होने वाली चुनौतियों का मुकाबला कैसे किया जाएगा?