पर्यवेक्षकों ने ऐसे बयानों को इस का संकेत माना है कि रूस जवाबी कदम उठाएगा। उनके मुताबिक चूंकि तुरंत ऑकुस से कोई सैनिक खतरा सामने नहीं आने वाला है, इसलिए मुमकिन है कि शुरुआत में रूस सिर्फ राजनीतिक गोलबंदी की कोशिश करे। लेकिन लंबी अवधि में वह इंडो-पैसिफिक में अपने मित्र देशों को परमाणु पनडुब्बी की टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कर सकता है।
वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपे एक विश्लेषण के मुताबिक रूस की परमाणु पनडुब्बी तकनीक को दुनिया की सर्वोत्तम तकनीकों में गिना जाता है। इस मामले में उसकी क्षमता चीन से भी बेहतर है। लेकिन अब तक रूस इस टेक्नोलॉजी को किसी और देश को देने से गुरेज करता रहा है। 1987 में तत्कालीन सोवियत संघ ने भारत को परमाणु क्षमता वाली पनडुब्बी जरूर थी, लेकिन उसने इसकी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं की थी।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर रूस ने दूसरे देशों को ये टेक्नोल़ॉजी देने का फैसला किया, तो उसके खरीदारों की कोई कमी नहीं रहेगी। उनके मुताबिक सबसे पहले वियतनाम और अल्जीरिया इसके लिए आगे आ सकते हैं। एक सैन्य विशेषज्ञ ने एशिया टाइम्स से कहा- ‘सच्ची बात यह है कि हमारी आंखों के सामने परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बियों एक नया बाजार तैयार हो रहा है।’
विशेषज्ञों की ये राय भी है कि रूस और चीन आगे चल कर समुद्री गठबंधन बना सकते हैं, ताकि वे ऑकुस की साझा सैनिक ताकत का मुकाबला कर सकें। उनके मुताबिक दोनों देशों के बीच सैन्य संबंध पहले से ही मजबूत हो रहे हैं। इसलिए ऐसी संभावना हवाई नहीं है। इसलिए रूस और चीन नौसैनिक मामलों में भी गठबंधन बना सकते हैं और ऐसा होना ऑकुस के लिए कोई अच्छी खबर नहीं होगी।