जर्मनी में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सिर्फ ग्रीन पार्टी को छोड़ कर देश में कोई और बड़ी राजनीतिक ताकत इस परियोजना के खिलाफ नहीं है। जर्मनी का उद्योग क्षेत्र भी इसके पक्ष में रहा है। जर्मनी ने साल 2038 तक कोयले से चलने वाले सभी बिजली संयंत्रों को बंद कर देने का फैसला किया है। ऐसे में इस पाइपलाइन से देश को ऊर्जा का सस्ता और भरोसेमंद स्रोत मिलेगा।
लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस परियोजना राजनीतिक और कूटनीतिक पक्ष समस्याग्रस्त हैं। इसे पूरा करने पर अड़े रह कर जर्मनी ने यूरोपीय एकता तोड़ दी है। इस परियोजना से यूक्रेन को खास नुकसान होगा। यूरोपीय देश रूस और यूक्रेन के विवाद में उसे कूटनीतिक समर्थन देते रहे हैं। लेकिन जब आर्थिक स्वार्थ की बात आई, तो जर्मनी ने यूक्रेन के हितों की पूरी अनदेखी कर दी।
दूसरी तरफ अमेरिका के जो बाइडन प्रशासन के रुख पर भी यूरोप में सवाल उठाए गए हैं। आम धारणा बनी है कि एक मजबूत यूरोपीय देश के सामने बाइडेन ने अपनी बुनियादी नीति पर समझौता कर लिया। इससे जहां यूरोप में जर्मनी की निष्ठा संदिग्ध हुई है, वहीं अपने सहयोगी देशों के हितों की रक्षा करने के प्रति बाइडेन प्रशासन की निष्ठा पर भी सवाल खड़े हुए हैं।
जर्मनी में ग्रीन पार्टी ने वादा किया है कि अगर सितंबर में होने वाले आम चुनाव में उसकी जीत हुई, तो वह नॉर्ड स्ट्रीम-2 परियोजना को रद्द कर देगी। लेकिन जानकारों का मानना है कि अमेरिका से जर्मनी के हाल में हुए समझौते के बाद ऐसा करना उसके लिए लगभग नामुमकिन हो गया है। वैसे भी हाल के चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षणों में ग्रीन पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट देखी गई है। ऐसे में ज्यादा संभावना यही है कि मर्केल की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन के नेतृत्व वाले गठबंधन के हाथ में ही सत्ता बनी रहेगी। मुख्य विपक्षी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी भी इस परियोजना के पक्ष में है। ऐसे इस परियोजना की राह में अब शायद ही कोई चुनौती बची है।