पूर्व अफगान अधिकारियों के मुताबिक बाइडन प्रशासन के इस फैसले से अफगानिस्तान सरकार की 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति जब्त हो गई है। पिछले 20 साल में जर्मनी भी अफगानिस्तान को अनुदान देने वाले बड़े देशों में शामिल था। उसने अब 50 करोड़ डॉलर की उस रकम का भुगतान रोक दिया है, जो इस साल अफगानिस्तान को मिलने वाली थी। यूरोपियन यूनियन ने अगले चार साल की अवधि में अफगानिस्तान को 1.4 अरब डॉलर की सहायता देने का एलान किया था। अब उसने भी इस रकम का भुगतान रोकने की घोषणा कर दी है।
मानवीय सहायता पहुंचाने वाली संस्था इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी के मुताबिक इस समय अफगानिस्तान में लगभग एक करोड़ 84 लाख लोगों को तुरंत मानवीय सहायता की जरूरत है। विश्लेषकों ने कहा है कि सहायता रकम रोकने के पश्चिमी देशों के फैसले से तालिबान के लिए राज करना जरूर मुश्किल हो जाएगा, लेकिन उसकी वजह से लाखों अफगान लोगों की मुसीबतें भी बढ़ेंगी। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि पिछले हफ्ते वेस्टर्न यूनियन और मनीग्राम ने अफगानिस्तान में अपनी सेवाएं रोक दीं। उससे जो अफगान विदेशों में काम करते हैं, उनके लिए अपनी कमाई हुई रकम को अपने परिवारों तक भेजना अब असंभव हो गया है।
रूसी वेबसाइट रशिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान ने 2020 में 1.6 अरब डॉलर खरीदे थे। रशिया टुडे ने ये खबर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की तरफ से तैयार कराई गई एक गोपनीय रिपोर्ट के हवाले से छापी है। अनुमान है कि इन डॉलरों के जरिए तालिबान कुछ दिन तक राजकाज का खर्च लाएगा। उसके बाद उसे अवैध स्रोतों से हासिल धन पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र ने हाल की अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि तालिबान का मुख्य वित्तीय स्रोत आपराधिक है। इनमें अफीम की खेती सबसे बड़ा स्रोत है। इसके अलावा तालिबान गैर-कानूनी खनन से भी पैसा बनाता है। कुछ खबरों के मुताबिक जिन इलाकों पर तालिबान ने पहले ही कब्जा जमा लिया था, वहां उसने एक खास ढंग की कर प्रणाली लागू की थी। उसके तहत खेती की फसल पर दस फीसदी और व्यक्तिगत धन पर 2.5 फीसदी टैक्स लगाया जाता था।