यूनिवर्सिटी में बाथ में सीनियर लेक्चरर ऑरिलियन मोंदो ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘इस घटनाक्रम से मैक्रों को यह दिखाने का मौका मिला है कि वे एक बड़े राजनेता हैं। फ्रांस में कुछ महीनों के बाद ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है। ऐसे में मैक्रों के पास मतदाताओं को यह दिखाने का मौका है कि उनके पास ऐसे पेचीदा मामलों से निपटने का अनुभव है, जो दूसरे उम्मीदवारों के पास नहीं है।’
विश्लेषकों के मुताबिक इस विवाद से मैक्रों को यह मौका भी मिला है कि वे रक्षा जैसे मुद्दे पर यूरोपीय देशों को एकजुट करने का प्रयास करें। यूनिवर्सिटी ऑफ कॉर्क में यूरोपीय राजनीति के लेक्चरर शोन क्विनलिवान के मुताबिक, ‘यह किसी से छिपा नहीं है कि मैक्रों नाटो के अंदर यूरोपियन यूनियन (ईयू) को एक स्तंभ के रूप में खड़ा करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि ईयू अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाए। अब ऑकुस से बहाने उन्हें यह कहने का मौका मिला है कि ईयू अमेरिका या ब्रिटेन पर निर्भर नहीं रह सकता।’
उधर ब्रिटिश जानकारों का कहना है कि बोरिस जॉनसन को भी ये तनाव अपने माफिक लगता है। यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रॉब फोर्ड ने सीएनएन से कहा- ‘जॉनसन ऐसे नेता हैं, जो तभी अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में होते हैं, जब किसी दुश्मन से लड़ रहे हों। ऐसे में ब्रेग्जिट के बाद फ्रांस से तनाव बढ़ाने को लेकर वे उत्साहित ही होंगे, क्योंकि अब उन्हें ईयू से दंडित होने का भी डर नहीं है।’