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पहले ब्रेग्जिट अब ऑकुस अलायंस: मैक्रों और जॉनसन दोनों को सूट कर रहा है फ्रांस-ब्रिटेन का मौजूदा तनाव

Tue, 28 Sep 2021 06:00 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस

सार

पर्यवेक्षकों के मुताबिक मैक्रों ने हमेशा खुद को यूरोप के सबसे गंभीर राजनेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है। ऐसे में उनकी गैर जानकारी में हुए ऑकुस करार से उनके लिए बेहद असहज स्थिति पैदा हुई। ब्रिटेन के साथ फ्रांस के संबंधों में तनाव ब्रेग्जिट के समय से ही बढ़ा हुआ था...
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बोरिस जॉनसन और इमैनुएल मैक्रों - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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ऑकुस (ऑस्ट्रेलिया- यूनाइटेड किंगडम- यूनाइटेड स्टेट्स) रक्षा समझौते के मसले ने ब्रिटेन और फ्रांस के संबंधों में दीर्घकालिक दरार डाल दी है। विश्लेषकों का अनुमान है कि जब तक इमनुएल मैक्रों फ्रांस के राष्ट्रपति हैं, दोनों देशों के बीच कड़वाहट घटने की संभावना बहुत की कम है। मैक्रों ने पीठ पीछे किए गए इस समझौते को अपने साथ धोखा माना है। इसके लिए वे ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका को माफ करने के मूड में नहीं हैं।

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पर्यवेक्षकों के मुताबिक मैक्रों ने हमेशा खुद को यूरोप के सबसे गंभीर राजनेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है। ऐसे में उनकी गैर जानकारी में हुए ऑकुस करार से उनके लिए बेहद असहज स्थिति पैदा हुई। ब्रिटेन के साथ फ्रांस के संबंधों में तनाव ब्रेग्जिट के समय से ही बढ़ा हुआ था। उसके बीच ऑकुस करार दोनों देशों के रिश्तों में एक तरह से ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ है।

एक मीडिया विश्लेषण में ध्यान दिलाया गया है कि फ्रांस सरकार ने ऑकुस करार पर विरोध जताने के लिए अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से अपने राजदूत वापस बुला लिए। लेकिन उसने ब्रिटेन से अपने राजदूत को वापस नहीं बुलाया। फ्रेंच मीडिया के मुताबिक ऐसा करके फ्रांस ने ब्रिटेन को यह संदेश दिया कि वह उसे गंभीरता से नहीं लेता। फ्रांस के यूरोपीय मामलों के मंत्री ने सार्वजनिक रूप से ब्रिटेन को अमेरिका ‘जूनियर पार्टनर’ और उसकी मर्जी से चलने वाला देश कहा।
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इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने फ्रांस से कहा कि वह अपने मामलों पर ध्यान दे। फ्रेंच मीडिया में जॉनसन की इस टिप्पणी को बचकाना बताया गया है। विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि फ्रांस और ब्रिटेन ऐसे पड़ोसी हैं, जहां परंपरागत रूप से एक दूसरे के प्रति नफरत रही है। ऐसे में माना जाता है कि एक दूसरे के खिलाफ सख्त रुख अपनाने वाले नेताओं की अपने देश में लोकप्रियता बढ़ती है।

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यूनिवर्सिटी में बाथ में सीनियर लेक्चरर ऑरिलियन मोंदो ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘इस घटनाक्रम से मैक्रों को यह दिखाने का मौका मिला है कि वे एक बड़े राजनेता हैं। फ्रांस में कुछ महीनों के बाद ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है। ऐसे में मैक्रों के पास मतदाताओं को यह दिखाने का मौका है कि उनके पास ऐसे पेचीदा मामलों से निपटने का अनुभव है, जो दूसरे उम्मीदवारों के पास नहीं है।’

विश्लेषकों के मुताबिक इस विवाद से मैक्रों को यह मौका भी मिला है कि वे रक्षा जैसे मुद्दे पर यूरोपीय देशों को एकजुट करने का प्रयास करें। यूनिवर्सिटी ऑफ कॉर्क में यूरोपीय राजनीति के लेक्चरर शोन क्विनलिवान के मुताबिक, ‘यह किसी से छिपा नहीं है कि मैक्रों नाटो के अंदर यूरोपियन यूनियन (ईयू) को एक स्तंभ के रूप में खड़ा करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि ईयू अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाए। अब ऑकुस से बहाने उन्हें यह कहने का मौका मिला है कि ईयू अमेरिका या ब्रिटेन पर निर्भर नहीं रह सकता।’

उधर ब्रिटिश जानकारों का कहना है कि बोरिस जॉनसन को भी ये तनाव अपने माफिक लगता है। यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रॉब फोर्ड ने सीएनएन से कहा- ‘जॉनसन ऐसे नेता हैं, जो तभी अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में होते हैं, जब किसी दुश्मन से लड़ रहे हों। ऐसे में ब्रेग्जिट के बाद फ्रांस से तनाव बढ़ाने को लेकर वे उत्साहित ही होंगे, क्योंकि अब उन्हें ईयू से दंडित होने का भी डर नहीं है।’
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