फ्रांस के औपनिवेशिक दौर के विशेषज्ञ इतिहासकार जाइल्स मैनसेरों ने इसी टीवी चैनल से कहा- ‘यह राजकीय अपराध था, जिसमें कई सरकारी अधिकारी और तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल द’गॉल शामिल दिखते हैँ, हालांकि द’गॉल ने सीधे तौर पर वहां की घटनाओं को निर्देशित नहीं किया था। द’गॉल ने उस घटना पर अफसोस जताया था, लेकिन उन्होंने उस पर परदा डालने की कोशिश भी की थी।’
मानव अधिकार और नस्लभेद विरोधी संगठनों और अल्जीरियाई समुदाय से जुड़ी संस्थाओं ने रविवार को पेरिस में एक श्रद्धांजलि मार्च निकाला। उन्होंने फ्रेंच अधिकारियों से मांग की वे उस घटना में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें। उन्होंने कहा कि अल्जीरिया की आजादी की लड़ाई के दौरान जो त्रासदियां और भयानक घटनाएं हुईं, उसकी जिम्मेदारी फ्रेंच अधिकारियों की है। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि उस दौर के और अधिक दस्तावेजों को फ्रांस सरकार सार्वजनिक करे।
हाल ही में मैक्रों की एक टिप्पणी को लेकर फ्रांस और अल्जीरिया में तनाव बढ़ गया था। दोनों देशों में विवाद इतना बढ़ा कि विरोध जताने के लिए अल्जीरिया ने पेरिस स्थित अपने राजदूत को वापस बुला लिया। साथ ही फ्रेंच सेना के विमानों के अल्जीरियाई वायु क्षेत्र के ऊपर से उड़ने पर रोक लगा दी। मैक्रों ने कहा था कि अल्जीरिया पर ‘राजनीतिक-सैनिक व्यवस्था’ का शासन था। इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अल्जीरिया ने कहा कि मैक्रों पूरी तरह से इतिहास को नया रंग देने की कोशिश कर रहे हैँ। उसने कहा- ‘हम इसे नहीं भूल सकते कि अल्जीरिया एक समय फ्रांस का उपनिवेश था। इतिहास को झूठे ढंग से पेश नहीं किया जा सकता।’