पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना वायरस की चपेट में है। दुनिया का हर देश इस महामारी से त्राहिमाम कर रहा है। ऐसे में अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोविड-26 और कोविड-32 से बचना है तो कोविड-19 की उत्पत्ति जानना बेहद जरूरी है। दरअसल, वैज्ञानिक का दावा है कि अगर इस वायरस के बनने का पता नहीं लग पाया तो पूरी दुनिया 2026 और 2032 में एक बार फिर महामारी की चपेट में होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि यह कोरोना क्या 2019 में ही फैला या पिछले 16 साल से दुनिया को अपनी चपेट में लेने के लिए तैयार हो रहा था? इस रिपोर्ट में जानने की कोशिश करते हैं कि कोरोना आया कहां से? इसकी उत्पत्ति आखिर कैसे हुई? क्यों इसे फैलाने का आरोप चीन स्थित वुहान लैब में चमगादड़ों पर रिसर्च करने वाली शी झेंगली पर लगा?
30 दिसंबर 2019 को मिला पहला मामला
अगर कोरोना की कहानी जाननी है तो सबसे पहले हमें कैलेंडर के पन्ने पलटने होंगे और शुरुआत 30 दिसंबर, 2019 से करनी होगी, जब दुनिया पहली बार कोरोना के नाम से रूबरू हुई। दरअसल, उस दिन चीन में कोरोना का पहला मरीज सामने आया था। इसके बाद यह महामारी पूरी दुनिया में फैलती चली गई। वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में सेंटर फॉर इमर्जिंग इंफेक्शियस डिजीज (बेहद संक्रामक रोगों की जानकार) की निदेशक शी झेंगली इसका खुलासा करती हैं। वह कहती हैं कि 30 दिसंबर, 2019 को शाम 7 बजे का वक्त हो रहा था। उस दौरान उन्हें सार्स सीओवी-2 (SARS-CoV-2) के बारे में पहली सूचना मिली, जिसे अब दुनिया भर में फैले कोविड-19 के सोर्स वायरस के रूप में जाना जाता है।
800 किमी दूर से जांच करने लौंटी झेंगली
एक मीडिया संस्थान को दिए इंटरव्यू में झेंगली ने बताया कि उस दिन उनके पास एक फोन कॉल आया। कॉलर ने उन्हें बताया कि वुहान लैब में कुछ रोगियों के नमूने आए हैं, जो एक असामान्य निमोनिया से पीड़ित हैं। झेंगली से कहा गया कि वह जो कुछ भी कर रही हैं, तत्काल छोड़ दें। तुरंत वुहान लैब लौटें और वायरस पर शोध करें। झेंगली उस वक्त वुहान से करीब 800 किमी दूर थीं। उन्होंने तुरंत ट्रेन पकड़ी और वुहान लैब पहुंच गईं। इसके बाद उन्होंने उस असामान्य निमोनिया पर शोध किया, जिसे बाद में कोरोना वायरस का नाम दिया गया।
कोरोना की उत्पत्ति पर अब तक हुई यह चर्चा
गौरतलब है कि मार्च-अप्रैल 2021 तक पूरी दुनिया और वैज्ञानिक यही मानते रहे कि SARS-CoV-2 वायरस जानवरों और मनुष्यों के बीच संपर्क से फैसला। इसके पीछे तर्क दिया गया कि चमगादड़ से कोरोनावायरस की दूसरी प्रजाति के वायरस से इंसान संक्रमित हो गए। हालांकि, इस कनेक्शन के पीछे किसी भी तरह का तर्क नहीं दिया गया। इस बीच एक और चर्चा शुरू हुई, जिसमें कहा गया कि कोरोना वायरस लैब मेड हो सकता है। इसे वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में तैयार किया गया। हालांकि, डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के बाद इस अवधारणा को भी खारिज कर दिया गया, लेकिन अब वुहान लैब एक बार फिर हर किसी के निशाने पर है।
झेंगली ने 16 साल में लिए 19 हजार नमूने
वुहान लैब भले ही कोरोना वायरस बनाने और फैलाने के आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। हालांकि, यह भी सच है कि शी झेंगली और उनकी टीम कोरोना फैलने यानी 2019 से 16 साल पहले से इस वायरस पर काम कर रही थी। वहीं, 2019 तक इसके 19,000 से अधिक नमूने एकत्रित कर चुकी थी। फिलहाल, यह कहा जा रहा है कि कोरोना 'लैब-मेड' वायरस नहीं था, लेकिन निश्चित रूप से उन वायरसों में से एक हो सकता है, जिनका वहां अध्ययन किया जा रहा था। इस मामले में शी झेंगली पर कोरोना फैलाने का आरोप लगाया गया है, लेकिन वह खुद को क्लीन चिट दे चुकी हैं।
फिर दुनिया में फैला कोरोना का खौफ
चीन के वुहान में कोरोना फैलने के कुछ ही महीनों बाद इसका प्रकोप पूरी दुनिया में नजर आने लगा। ऐसे में शी झेंगली की टीम ने दो सप्ताह तक इस वायरस पर शोध किया। उन्होंने वायरस के जीनोम में हुए बदलाव की जानकारी डब्ल्यूएचओ के साथ साझा की। हालांकि, जब तक महामारी का असली रूप सामने आया, तब तक 80 लोगों इसके शिकार बन चुके थे। झेंगली और उनकी टीम के शोध में दावा किया गया कि यह वायरस प्राकृतिक तरीके से फैला। इस नए निमोनिया का संभावित स्रोत एक जलाशय बताया गया, जहां चमगादड़ मरे हुए मिले थे। फरवरी 2020 में प्रकाशित एक लेख में दावा किया गया कि नया वायरस पुराने सार्स से 79.6 फीसदी मिलता-जुलता है, लेकिन इसमें चमगादड़ में मिलने वाले कोरोनावायरस 96 फीसदी से अधिक हैं। हालांकि, बाद में यह दावा भी किया गया कि वुहान के सी-फूड मार्केट से यह महामारी फैली। यह भी कहा गया कि शी झेंगली इसका पता लगाने गई थीं, जिसके बाद वायरस के ट्रेसेज लैब के दरवाजों व अन्य जगह मिले।
एक-दूसरे की विरोधी थीं शुरुआती अवधारणाएं
कोरोना फैलने को लेकर शुरुआत में दो तरह के दावे किए गए। पहला यह कि चमगादड़ में पाए जाने वाले कोरोनावायरस से यह 96 फीसदी मिलता-जुलता है। दूसरा यह कि वायरस सी-फूड मार्केट से फैला। अहम बात यह है कि दोनों ही अवधारणाएं एक-दूसरे के उलट थीं। हालांकि, लगातार जारी हो रहे उल्लेखों, उद्धरणों, बयानों और साक्षात्कारों के बीच एक अस्पष्ट कहानी भी सामने आई। इसमें कहा गया कि कोरोना के प्रकोप को रोकने के लिए 16 साल से शोध चल रहा था, जिसके ट्रेसेज लैब के दरवाजे पर मिले थे। दरअसल, शी झेंगली ने अपने बयानों में एक ऐसे वायरस की जानकारी भी दी, जो SARS-CoV-2 जैसा था, जिसे RaTG13 नाम दिया गया। इसके बाद झेंगली द्वारा वायरस फैलने की आशंका जाहिर की जाने लगी।
2012 में मिला था रहस्यमयी निमोनिया
गौरतलब है कि अप्रैल 2012 के दौरान चीन में 6 नाबालिग रहस्यमयी निमोनिया की चपेट में आ गए। इसका असर बच्चों के रेस्पिरेटरी सिस्टम पर हुआ और तीन की मौत हो गई। ये लोग एक बंद पड़ी कॉपर की खदान में काम करते वक्त चमगादड़ों की चपेट में आ गए थे। इसी साल कुछ महीने बाद शी झेंगली और उनकी टीम को 4 सीरो सैंपल मिले, जिनमें तीन मरीज बच गए, लेकिन एक की मौत हो गई। उन्होंने इसका मिलान इबोला, निपाह और सार्स से किया, लेकिन रिपोर्ट निगेटिव आई। उसके बाद 2015 तक झेंगली और उनकी टीम ने उन गुफाओं से 1322 सैंपल जुटाए, जिनमें 293 सैंपल अलग-अलग तरीकों के कोरोनावायरस के थे। इनमें 8 सैंपल बीटा कोरोनावायरस के थे, जबकि इन 8 में से एक RaTG13 वायरस था, जिसकी पहचान 2016 में हुई। इसे RaBtCoV/4991 नाम दिया गया। यह वायरस पुराने सार्स वायरस से एकदम अलग था, जिसे वायरस का नया स्ट्रेन कहा गया। उस दौरान माना गया कि बीटा कोरोना वायरस सार्स और मर्स के नए रूप हैं।
झेंगली लगातार खारिज करती रहीं कोरोना की थ्योरी
दो साल बाद यानी 2018 में RaTG13 वायरस और ज्यादा अनुक्रमित हो गया। वहीं, इसके दो साल बाद यानी 2020 में जब इसका मिलान SARS-CoV-2 से किया गया तो 96.2 फीसदी समानता मिली। हालांकि, नवंबर 2020 में प्रकाशित एक लेख में झेंगली ने फरवरी 2020 के उस दावे को दोहराया, जिसमें कहा गया था कि 2012 के दौरान संक्रमित हुए मजदूरों के सैंपल का मिलान SARS-CoV-2 से किया गया था, लेकिन नतीजे निगेटिव आए थे। इसका मतलब यह था कि मजदूरों कोरोना से संक्रमित नहीं हुए थे। यह निष्कर्ष लैब से कोरोना फैलने की अवधारणा सामने आने के कुछ महीने बाद दिया गया। हालांकि, कुछ शोध में यह दावा किया गया कि उन मजदूरों को चमगादड़ों के चलते संक्रमण हुआ था, लेकिन झेंगली ने कहा कि अगर ऐसा होता तो खदान में लंबे समय तक वायरस मिलता। झेंगली ने कहा कि वे मजदूर एक जलाशय में फैले फंगल निमोनिया के संपर्क में आए थे।