यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने अपने यहां माइक्रोचिप्स के उत्पादन की बड़ी महत्त्वाकांक्षा जताई है। वह चाहता है कि इसके लिए वह उतना निवेश करे, जितना अमेरिका में किया जा रहा है। लेकिन ईयू के भीतर निर्णय की धीमी प्रक्रिया और ईयू के अपने प्रतिस्पर्धा संबंधी नियमों की वजह से उसकी ये महत्त्वाकांक्षा फिलहाल पूरी होती नहीं दिखती।
कोरोना वायरस महामारी आने के बाद से सेमीकंडक्टर की सप्लाई बाधित है। इसे देखते हुए अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और ताइवान ने इसके उत्पादन के लिए बड़ी सब्सिडी का एलान किया है। अमेरिका में चिप्स फॉर अमेरिका एक्ट का खाका तैयार किया गया है, जिसके तहत इस इंडस्ट्री के लिए 52 अरब डॉलर का प्रावधान किया जाएगा। दक्षिण कोरिया ने बीते मई में अपनी रणनीति घोषित की थी, जिसके तहत माइक्रोचिप उद्योग के लिए प्राइवेट सेक्टर में 450 अरब डॉलर निवेश के उपाय किए गए। इन उद्योग के लिए इस रणनीति के तहत वहां बड़ी टैक्स रियायत घोषित की गई।
ईयू और अमेरिका की ट्रेड एंड टेक काउंसिल की एक बैठक में अधिकारियों ने कहा कि इन दोनों पक्षों को सब्सिडी दौड़ में शामिल होने से बचना चाहिए। उनके मुताबिक ऐसा करने से इस क्षेत्र में निवेश की भीड़ लग जाएगी। उससे दूरगामी नुकसान होगा। इस बीच ईयू ने चिप सेक्टर के लिए अपनी एक नई पहल- इंपॉर्टेंट प्रोजेक्ट ऑफ कॉमन यूरोपियन इंटरेस्ट योजना के तहत की है।
लेकिन वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईयू की घोषणाएं यूरोपियन कंपनियों में भरोसा नहीं जगा पाई हैं। यूरोपीय आयोग अपने सदस्य देशों को इस क्षेत्र में अरबों यूरो के निवेश के लिए प्रेरित कर रहा है। लेकिन वेबसाइट पॉलिटिको के एक विश्लेषण के मुताबिक सदस्य देशों से ईयू अधिकारियों ने इस मकसद से खास बातचीत की, उनमें से दस ने अपनी योजनाओं में चिप इंडस्ट्री का कोई जिक्र नहीं किया है। सिर्फ छह देश ऐसे हैं, जिन्होंने चिप इंडस्ट्री के लिए बजट तय किया है। जबकि बाकी देशों ने चिप इंडस्ट्री के ऊपर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, और दूसरी तकनीकों में निवेश को प्राथमिकता दी है।