लेकिन आलोचकों का कहना है कि ऐसी ऊंची बातों से ये सच नहीं छिप सकता कि इस मामले में यूरोपियन यूनियन का रिकॉर्ड कमजोर है। यूरोप में डिजिटल एकाधिकार (मोनोपॉली) विरोधी सर्वोच्च अधिकारी मार्गरेट वेस्तागार ने एपल और अमेजन कंपनियों पर सख्त नियम लागू करने के लिए अभियान चलाया था। लेकिन उसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली। जबकि अमेरिका का फेडरल ट्रेड कमीशन फेसबुक पर पांच अरब यूरो का जुर्माना लगा चुका है। ये रकम ईयू ने अपने प्राइवेसी कानून के तहत टेक कंपनियों पर जो जुर्माना लगाया है, उससे पांच गुना ज्यादा है। साथ ही अमेरिका में जो बाइडन प्रशासन ने लीना खान को मोनोपॉली विरोधी संस्था का प्रमुख नियुक्त किया है, जो बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए मशहूर रही हैं। खबरों के मुताबिक लीना खान की नियुक्ति के बाद से बड़ी कंपनियों के अधिकारी परेशान हैं। वे उन्हें हटवाने के लिए जोरदार लॉबिंग कर रहे हैं।
उधर, चीन ने तो हाल में बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ लगभग जंग छेड़ रखी है। इसमें उसने अपने यहां की सबसे बड़ी कंपनी अलीबाबा तक को नहीं बख्शा है। लेकिन स्टेनफॉर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. शाके ने कहा- ‘चीन में बड़ी टेक कंपनियों पर जिस तरह लगाम लगाई गई है, उसके पीछे सरकारी सख्ती का नजरिया है। यूरोप या अमेरिका में वैसे उसूल नहीं हैं। इसलिए वहां वहां ऐसी कार्रवाई नहीं हो सकती।’ जानकारों का कहना है कि बड़ी टेक कंपनियों पर कार्रवाई की जरूरत आज दुनियाभर में महसूस की जा रही है। अब देखने की बात यह होगी कि इस लिहाज से किसका मॉडल अधिक प्रभावी साबित होता है।