अमेरिकी थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में जर्मन मामलों के विशेषज्ञ कोस्तांजे स्टेलजेनमूलर ने अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा है- ‘मैर्केल संकट के समय सावधानी से और धीरे-धीरे चलने में यकीन करती हैं। लेकिन अब जो चुनौतियां सामने हैं, उनके बीच अगले चांसलर के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा। जलवायु परिवर्तन और चीन जैसे मसलों पर मैर्केल ने यथास्थिति कायम रखने की नीति अपनाई।’
थिंक टैंक जर्मन मार्शल फंड की विश्लेषक सुधा डेविड विल्प ने एक टिप्पणी में लिखा है कि रूस और चीन के साथ संबंधों को लेकर अब जर्मनी में आम सहमति में बदलाव आ रहा है। ऐसे में अगले चांसलर के लिए मैर्केल की तरह लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत करने और अमेरिका से करीबी संबंध रखने के साथ-साथ जर्मनी के निर्यात के हित में चीन से अच्छे संबंध बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। इस सिलसिले में ध्यान दिलाया गया है कि मैर्केल ने चीनी 5जी कंपनी हुवावे के खिलाफ कार्रवाई को देर तक लटकाए रखा। साथ ही वे यूरोप के चीन के साथ निवेश समझौते की वकालत करती रहीं।
जर्मन मीडिया में कहा गया है कि ओल्फ शोल्ज और अरमिन लैशेट दोनों मैर्केल की नीतियां जारी रखने की बात कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि शोल्ज की कार्यशैली मैर्केल के अधिक अनुरूप है, भले वे दूसरी पार्टी के उम्मीदवार हों। मैर्केल को जर्मनी में बहुत से लोग मुट्टी यानी मां कह कर संबोधित करते हैं। वे आज भी देश की सबसे लोकप्रिय नेता हैं। स्टेलजेनमूलर ने कहा है कि ऐसी अनुभवी नेता के कुर्सी पर ना रहने की कमी तुरंत महसूस की जाएगी। बहुत से लोगों में उससे असुरक्षा का भाव भी आ सकता है।
एक यूरोपीय राजनयिक ने मीडिया से बातचीत में कहा गया है कि नया चांसलर कोई भी बने, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी तुरंत मैर्केल जैसी हैसियत नहीं बन पाएगी। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या वह मैर्केल की तरह नीतियों में स्थिरता बनाए रखेगा, या इस मामले में उथल-पुथल का दौर अब शुरू हो जाएगा।