जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल अपने पूरे कार्यकाल में एक प्रतिष्ठित राजनेता रही हैं। उनके विपक्षी भी उनका आदर करते रहे हैं। लेकिन अब कार्यकाल के आखिरी महीनों में उसकी साख पर दाग लग रहे हैं। अभी हाल में दो राज्यों के चुनाव में अपनी पार्टी- क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) की बुरी हार के झटके से अभी वे उबरी भी नहीं हैं कि देश में ईस्टर के मौके पर लॉकडाउन लगाने के मसले पर नया विवाद खड़ा हो गया है। विपक्ष ने अब इस मुद्दे पर उनसे अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने की मांग की है।
गौरतलब है कि पहले मैर्केल ने कोरोना संक्रमण के फैलाव को देखते हुए ईस्टर की छुट्टियों के दौरान सख्त लॉकडाउन लगने का एलान किया था। लेकिन बाद उन्होंने कहा कि ये घोषणा उनकी गलती की वजह से हो गई। मैर्केल ने सफाई दी कि ईस्टर की छुट्टियों के दौरान उतने सख्त प्रतिबंध लागू नहीं होंगे, जितना पहले बताया गया था। इस साल ईस्टर चार अप्रैल को है।
विपक्ष ने मैर्केल पर गलत निर्णय लेने का आरोप लगाया है। कई विपक्षी नेताओं ने कहा है कि इसे लेकर जर्मन संसद बुंडेस्टैग में अविश्वास प्रस्ताव लाया जाना चाहिए। फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी (एफडीएफ) के नेता क्रिश्चियन लिडनर ने बुधवार को एक ट्विट में कहा कि अब मैर्केल सरकार की कदम उठाने की क्षमता की जरूर पड़ताल होनी चाहिए। उन्होंने कहा- ‘अब चांसलर इस बात को लेकर निश्चिंत नहीं रह सकतीं कि उनके गठबंधन सहयोगियों का समर्थन उनके साथ बना रहेगा।’
एफडीपी के ही नेता और बुंडेस्टैग के उपाध्यक्ष वोल्फगैंग कुबिकी ने भी अविश्वास प्रस्ताव लाने के इरादे का समर्थन किया है। जर्मन अखबार बिल्ड से बातचीत में उन्होंने कहा- मैं चांसलर से अनुरोध करता हूं कि वे अविश्वास प्रस्ताव का सामना करें। इसकी वजह यह है कि उन्होंने न सिर्फ अपनी अयोग्यता स्वीकार की है, बल्कि उनके मंत्रियों की अयोग्यता भी अब जग-जाहिर है।
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी और वामपंथी पार्टी डाय लिंके ने भी कहा है कि अब देश में राजनीतिक नेतृत्व के प्रति अविश्वास का संकट खड़ा हो गया है। दोनों पार्टियों ने कहा कि मैर्केल सरकार शौकिया नजरिए से काम कर रही है। इसलिए अब उसे अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना चाहिए। पर्यवेक्षकों का कहना है कि विपक्ष की तैयारी को देखते हुए लगता है कि जल्द ही ये प्रस्ताव पेश किया जाएगा।
मैर्केल ने पहले ईस्टर की छुट्टियों के मौके पर पांच दिन का लॉकडाउन लागू करने का एलान किया था। इसकी देश में कड़ी आलोचना हुई। उसके बाद उन्होंने ये घोषणा वापस ले ली। उस मौके पर उन्होंने कहा- ‘ये एलान गलती से हुआ। यह सिर्फ मेरी गलती है।’ पूर्व घोषित लॉकडाउन के तहत तमाम कारोबार बंद करने, सुपरमार्केट्स के खुले रहने की अवधि घटाने, और दो परिवारों के पांच से ज्यादा बालिग लोगों के एकत्र होने पर रोक लगाने के प्रावधान थे। मैर्केल ने यह भी कहा था कि ईस्टर के मौके पर चर्च सर्विस सिर्फ ऑनलाइन माध्यम से की जाएगी।
मैर्केल सरकार देश में कोरोना महामारी के फैलाव और टीकाकरण की धीमी गति को लेकर पहले से आलोचनाओं के केंद्र में है। जर्मनी में कोरोना संक्रमण की नई लहर आई हुई है, जिससे फिलहाल प्रति एक लाख आबादी पर 107 लोग संक्रमित हैं। ये दर तीन हफ्ते पहले की तुलना में दो गुना हो चुकी है। इसके बावजूद कम सप्लाई के कारण टीकाकरण की गति तेज नहीं हो पा रही है। उधर पिछले दिनों मास्क सप्लाई घोटाले के हुए खुलासे के कारण भी मैर्केल की पार्टी कठघरे में है।
इस कारण विपक्ष ने अब अपने लिए एक मौका देखा है। अतीत में जब कभी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, उससे विपक्ष को कोई खास लाभ नहीं हुआ। वैसे ताजा जनमत सर्वक्षणों के मुताबिक मैर्केल की लोकप्रियता अभी भी कायम है। बिल्ड अखबार के इसी महीने कराए गए सर्वे में 53.5 फीसदी लोगों ने उनके कामकाज को अच्छा बताया। उनके कामकाज को खराब मानने वाले लोगों की संख्या 33 फीसदी रही। इसके बावजूद ये साफ है कि ताजा विवादों ने मैर्केल की विरासत को लांछित कर दिया है।
जर्मनी में अगले सितंबर में आम चुनाव होंगे। मैर्केल ने एलान कर दिया है कि ये उनका आखिरी कार्यकाल है। चुनाव के बाद वे निर्वाचित नेता को अपना पद सौंप देंगी। लेकिन ये नेता उनकी ही पार्टी का होगा, अब इसको लेकर संशय खड़ा हो गया है, जबकि कुछ समय पहले तक इसे तय माना जाता था।