विश्लेषकों के मुताबिक जो बाइडन ने अपने नजरिए की व्याख्या चीन के साथ ‘चरम प्रतिस्पर्धा’ कह कर की है। लेकिन ये साफ है कि चीन ने इसे स्वीकार नहीं किया है। बाइडन की समझ यह है कि चीन के साथ अमेरिकी रुख को अलग-अलग श्रेणियों में बांट कर देखा जा सकता है। इसके तहत चीन सरकार के समर्थन होने से वाली हैकिंग, शिनजियांग में कथित मानवाधिकार दमन, कथित अनुचित व्यापार व्यवहार आदि के प्रति अमेरिका सख्त रुख रखेगा। लेकिन वह जलवायु परिवर्तन जैसे मसलों पर चीन के साथ सहयोग भी करेगा।
लेकिन अमेरिकी विश्लेषकों का कहना है कि ये समझ कारगर साबित नहीं हुई है। इसका नतीजा हुआ है कि अमेरिकी अधिकारियों को अपमानित होना पड़ा है। दो हफ्ते पहले राष्ट्रपति बाइडन के जलवायु दूत जॉन केरी चीन गए, तो वहां उन्हें भी अपमान झेलना पड़ा। चीन के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनसे वीडियो कॉल के जरिए बातचीत की। व्यक्तिगत रूप से उन्हें मिलने के लिए चीन ने जूनियर अधिकारियों को भेज दिया। जबकि जुलाई में तालिबान के प्रतिनिधिमंडल से मिलने के लिए चीन के वरिष्ठ अधिकारी गए थे।
बाइडन प्रशासन भी अब यह स्वीकार कर रहा है कि चीन के साथ संबंधों में कोई प्रगति नहीं हो रही है। इसीलिए पिछले गुरुवार को जो बाइडन ने अपनी पहल पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से फोन पर बात की। लेकिन उस दौरान भी कोई प्रगति होने के संकेत नहीं हैं। व्हाइट हाउस ने कहा कि राष्ट्रपति ने फोन इसलिए किया, ताकि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा टकराव का रूप न ले।
इस बारे में सीआईए के पूर्व अधिकारी क्रिस जॉनसन ने कहा है- ‘अगर राष्ट्रपति बाइडन शी जिनपिंग को यह संदेश देना चाहते हैं कि हम टकराव को हाथ से नहीं निकलने देना चाहते, लेकिन साथ ही वे चीन पर सैनिक दबाव भी बढ़ाना चाहते हैं, तो साफ है कि बातचीत कहीं आगे नहीं बढ़ेगी।’