कोरोना वायरस को लेकर रोजाना नए-नए अध्ययन हो रहे हैं। एक नए अध्ययन के मुताबिक, ऑनलाइन कोविड-19 गलत सूचना के प्रसार के पीछे बॉट का हाथ है। इन बॉट्स के जरिए ही सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा अफवाह और गलत सूचनाएं फैलाई जा रही हैं। शोधकर्ताओं ने महामारी से संबंधित अलग-अलग लिंक को तीन लाख से ज्यादा पोस्ट में साझा किया। ये ज्यादातर मास्क पहनने से संबंधित थीं और इन्हें फेसबुक समूहों में साझा किया गया था।
बॉट्स की गतिविधियों को देखने के लिए शोधकर्ताओं ने इन लिंक को शेयर करने के लिए एक विशेष समय को निश्चित किया। शोधकर्ताओं ने जानकारी दी कि बार-बार साझा करना या समूहों में एक ही लिंक के कई पोस्ट केवल कुछ सेकेंड के अंतराल में साझा करना, बॉट गतिविधि के संकेत हैं।
ये शोध कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी और जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर की। शोधकर्ताओं ने फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को सख्ती करने के लिए कहा है। विश्व स्वास्थय संगठन ने एक बार बयान दिया था और कोरोना वायरस को गलत सूचनाओं का इंफोडैमिक बताया था।
एक शोधकर्ता का कहना है कि बॉट्स को कोरोना के गलत सूचना के प्रसार में प्राथमिक स्रोत माना गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि डेनमार्क में किए गए अध्ययन को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और खासकर फेसबुक पर कोविड-19 से संबंधित गलत सूचना को प्रसार किया गया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ ही सेकंड में कई सारी पोस्ट, कई सारे समूह में साझा की जा रही हैंं, जो कि दिखाता है कि पोस्ट शेयर करने वाले अकाउंट्स बॉट्स थे, जो एक समान नेटवर्क से संचालित किए जा रहे थे। शोधकर्ताओं ने बताया कि हमारे शोध में पाया गया कि बॉट्स ने गलत सूचना फैलाने के लिए एक प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल के एक प्रमुख प्रकाशन को गलत बताया। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह दिखाता है कि कोई भी सामग्री हथियारमुक्त गलत सूचना के खतरों से सुरक्षित नहीं है।
गलत सूचना वाले इन पोस्ट को साझा होने से रोकने के लिए शोधकर्ताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और अन्य को निर्देश दिए हैं कि वो गलत सूचना फैलाने वाले बॉट्स पर कार्रवाई करें और सख्ती करें। शोधकर्ताओं का कहना है कि फेसबुक के लिए इन बॉट्स की पहचान करना आसान है।