एशिया-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में मुक्त व्यापार समझौतों के प्रति अमेरिका की जारी बेरुखी का फायदा चीन को मिल रहा है। ये बात एशिया-प्रशांत क्षेत्र के नेताओं की बैठक में फिर जाहिर हुई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 11 देशों के कॉम्प्रिहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फॉर ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (सीपीटीपीपी) से अपने देश को बाहर निकाल लिया था। जो बाइडन प्रशासन ऐसे व्यापारिक सहयोग के बारे में अब तक अपना कोई साफ नजरिया तय नहीं कर पाया है।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बुधवार को एशिया-पैसिफिक आर्थिक सहयोग (एपेक) देशों की शिखर बैठक को संबोधित किया। इसमें उन्होंने वैचारिक आधार पर देशों के गोलबंद होने की कोशिशों का जिक्र किया और कहा कि ऐसे प्रयासों का विफल होना तय है। उन्होंने कहा कि एशिया–प्रशांत क्षेत्र को शीत युद्ध के काल की तरह टकराव में नहीं झोंका जाना चाहिए। पर्यवेक्षकों का कहना है कि शी की इन बातों का निशाना अमेरिका और उसके निकट सहयोगी देश हैं।
क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) मुक्त व्यापार समझौते में अपनी अहम भूमिका बनाने के बाद अब चीन सीपीटीपीपी में भी शामिल होने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। इस मुक्त व्यापार समझौते में सिंगापुर, चिली और न्यूजीलैंड जैसे अमेरिका के निकट सहयोगी देश शामिल हैं। सिंगापुर स्थित एशियन ट्रेड सेंटर के संस्थापक देबराह एल्म्स ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘अमेरिका की इस क्षेत्र में व्यापारिक स्थिति कमजोर हो चुकी है। वह लगातार पिछड़ता जा रहा है। अब अमेरिका में फिर ऐसा प्रशासन है, जो अमेरिका फर्स्ट नीति को तरजीह दे रहा है, भले वह ऐसा दूसरे नाम से कर रहा हो।’
जानकारों के मुताबिक अगर चीन को सीपीटीपीपी की सदस्यता मिल गई, तो उससे उस पर लगा ये आरोप कमजोर पड़ जाएगा कि वह व्यापार नियमों का पालन नहीं करता। इस व्यापार समझौते की सदस्यता उन देशों को ही दी जाती है जो बाजार अर्थव्यवस्था के नियमों का पूरा पालन करते हैं।