दुनियाभर में जब कोरोनावायरस महामारी की शुरुआत हुई, तब चीन के संक्रमण रोकने के तरीके हर तरफ सवालों के घेरे में थे। चीनी सरकार के मानवाधिकार उल्लंघन और अपने नागरिकों पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों को लेकर भी। हालांकि, बीते डेढ़ सालों में चीन की यह नीति काफी कारगर रही और जब पूरी दुनिया महामारी के बुरे दौर से गुजर रही थी, तब जिनपिंग सरकार अपने समर्थकों का भरोसा जीतने में कामयाब रही। इस बीच डेल्टा वैरिएंट के सामने आने के बाद से चीन की सख्ती की नीति भी नाकाम हुई है। लेकिन राष्ट्रवादी समर्थकों को अब चीन की नीति पर सवाल उठाना बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहा है। इसका ताजा शिकार चीन के सबसे बड़े महामारी विशेषज्ञ भी हुए हैं, जिन्होंने हाल ही में कोरोना के केस बढ़ने पर कहा था कि लोगों को इस वायरस के साथ जीना सीखना होगा।
क्या रही है कोरोना को रोकने की चीन की अब तक की नीति?: पिछले डेढ़ सालों में चीन कोरोना संक्रमितों की संख्या कम रखने में काफी हद तक सफल रहा है। इसके पीछे उसकी कई ऐसी नीतियां हैं, जिन्हें पश्चिमी देशों ने दमनकारी तक करार दे दिया। लेकिन देश के साथ शहरों के बॉर्डर बंद करने से जुड़े फैसले हों या लोगों को घर से बाहर निकलने से रोकने के, चीन ने इन्हीं कदमों से संक्रमण पर अपनी जीरो टॉलरेंस नीति को आगे बढ़ाया है।
खुद देश के कम्युनिस्ट शासन ने अपनी इस नीति का देश में जोर-शोर से प्रचार किया और ब्रिटेन-अमेरिका जैसे देशों (जहां कोरोना की तीन लहरें आ चुकी हैं) के लोकतांत्रिक सिस्टम के ऊपर तानाशाही सिस्टम को बेहतर करार दिया। इसका असर यह हुआ कि चीन के राष्ट्रवादियों ने भी बाकी देशों के मुकाबले अपनी तानाशाही नीति का समर्थन शुरू कर दिया।
डेल्टा वैरिएंट ने बिगाड़ा सारा खेल: मार्च 2021 में डेल्टा वैरिएंट के उभरने के बाद इसका असर चीन में भी देखा गया। ज्यादा प्रसार और वैक्सीन को भी बेअसर करने की क्षमता की वजह से बीते कुछ दिनों में चीन में कोरोना केस बढ़े हैं। सबसे पहले डेल्टा वैरिएंट की वजह से देश के एक सबसे व्यस्त एयरपोर्ट में सफाईकर्मी संक्रमित पाए गए थे। इसके बाद ये वैरिएंट चीन के 31 प्रांतों में फैल गया। इसके चलते प्रतिबंधों के बावजूद पिछले तीन हफ्तों में एक हजार कोरोना केस आ चुके हैं। जबकि इससे पहले चीनी सरकार का दावा था कि उसकी वैक्सीन 1.9 अरब लोगों को लगाई जा चुकी है और डेल्टा वैरिएंट के फैलने का खतरा सबसे कम है।
क्या बोले थे चीन के सबसे बड़े महामारी विशेषज्ञ?: चीन में डेल्टा वैरिएंट के चलते आई लहर पर देश के सबसे बड़े महामारी विशेषज्ञों में शुमार झांग वेनहोंग ने वीबो पर एक पोस्ट किया था। उन्होंने लिखा था- "हो सकता है कि मौजूदा वैक्सीन कोरोनावायरस को पूरी तरह खत्म करने में सक्षम न हों और कोरोना का फैलना टीकाकरण पूरा होने के बाद भी जारी रहे। लेकिन इसके बाद मौतों की संख्या कम हो सकती है।"
झांग ने आगे कहा था, "अब तक हम जिन चीजों से गुजरे हैं, वो सबसे कठिन हिस्सा नहीं है। अब कठिनाई कोरोनावायरस के साथ जीने की तैयारी के लिए बुद्धिमानी हासिल करने में है।" गौरतलब है कि चीन के एंथनी फौची कहे जाने वाले झांग का यह बयान दुनियाभर के वैज्ञानिकों के बयान के मुताबिक ही है। ब्रिटेन, सिंगापुर और भारत में तो सरकारों ने वायरस के साथ जीने के बयान का समर्थन भी किया है, लेकिन चीन में झांग का बयान लोगों को रास नहीं आया और लोगों ने उन्हें गद्दार तक करार दे दिया।
झांग के विरोध में क्या बोले चीनी नागरिक?: झांग के सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर लोगों ने उन पर जमकर निशाना साधा। कुछ ने तो यहां तक आरोप लगा दिया कि झांग पश्चिमी विचारों की पूजा करते हैं और वे विदेशी ताकतों से मिलकर चीन की कोरोना प्रतिक्रिया को तबाह करना चाहते हैं। कुछ और लोगों ने उनके शैक्षिक रिकॉर्ड पर भी सवाल उठा दिए। यहां तक कि दो दशक पहले प्रकाशित हुई उनकी डॉक्टोरल थीसिस तक निकाल लाए और उन पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाने लगे।
शंघाई की प्रतिष्ठित फुदान यूनिवर्सिटी, जहां से झांग ने अपनी डॉक्टोरल डिग्री ली और जहां वे मौजूदा समय में पढ़ाते हैं, ने एक बयान जारी कर कहा कि उन्हें झांग के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं और वे उनकी थीसिस पर लगे आरोपों के बारे में जानते हैं। यूनिवर्सिटी ने कहा कि वह इन आरोपों पर जांच भी बिठा रही है।