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तालिबान: अब बदला लेने पर उतारू, घर-घर ढूंढ रहा अमेरिका और नाटो सैन्य बलों के साथ काम करने वालों को

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Fri, 20 Aug 2021 07:13 PM IST

सार

संयुक्त राष्ट्र के एक गोपनीय दस्तावेज़ में इस खतरे का आकलन किया गया है कि तालिबान अमेरिका और नाटो सैन्य बलों का साथ देने वाले लोगों को घर-घर जाकर तलाश रहा है। इससे अफगान नागरिकों में और भय पैदा हो गया है और उन्हें अपनी जान गंवाने का डर सता रहा है। 
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तालिबान - फोटो : PTI


इससे अफगान नागरिकों को इस बात का डर सताने लगा है कि अमेरिकी और नाटो सेना का सहयोग करने या उनके साथ काम करने वाले लोगों को बंदी बनाया जाएगा, उन्हें यातनाएं दी जा सकती हैं या उनकी हत्या की जा सकती है।  ऐसे लोगों की संख्या हजारों में है जिन्होंने अफगान सरकार के कहने पर अमेरिकी और नाटो सैनिकों की मदद की थी। 


सामूहिक सजा की आशंका

संयुक्त राष्ट्र को खुफिया जानकारी देने वाली नॉर्वेजियन सेंटर फॉर ग्लोबल एनालिसिस ने यह रिपोर्ट  तैयार की है। रिपोर्ट तैयार करने वाले समूह के प्रमुख क्रिश्चियन नेलेमैन ने बीबीसी को बताया कि  तालिबान की काली सूची में शामिल हर एक व्यक्ति गंभीर खतरे में है, और उन्हें सामूहिक सजा भी दी जा सकती है।


ऐसे में कई अफगान और विदेशी नागरिक जल्द से जल्द अफगानिस्तान  छोड़ना चाहते हैं। काबुल हवाईअड्डे पर लगातार अफरातफरी मची हुई है जहां पश्चिमी देश अपने नागरिकों और उनके साथ काम करने वाले अफगानों को निकाल रहे हैं। काबुल हवाईअड्डे से पिछले पांच दिनों में 18,000 से अधिक लोगों को निकाला गया है। 


नाटो बहुत ही चुनौतिपूर्ण परिस्थितियों में काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर संचालन बनाए रखने के लिए काम कर रहा है। जबकि तालिबान लड़ाके काबुल हवाई अड्डे के रास्ते में ऐसे लोगों की जांच कर रहे हैं और यह तलाश तेज कर दी गई है। तालिबान भागने की कोशिश कर रहे अफगानों को रोक रहा है।


तालिबान का इंकार

हालांकि तालिबान ने इस बात से इंकार किया है कि उसके लड़ाके घरों में घुसकर लोगों को निकाल रहे हैं। तालिबान प्रतिशोध लेने के बात से भी इंकार कर रहा है लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में लगातार यह बात सामने आ रही है कि स्थानीय स्तर पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। 


तालिबान को मिटाने के लिए बना आईएसएएफ  

2001 में 9/11 के हमलों के बाद अल-कायदा को शरण देने के लिए तालिबान सहित इन दोनों सगंठनों की कमर तोड़ने के लिए अमेरिका ने अपने सैनिकों को अफगानिस्तान भेजा था। साथ ही नाटो सहयोगी की सेना भी अफगानिस्तान यह सुनिश्चित करने पहुंच गई कि फिर से अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों के लिए एक सुरक्षित आश्रय न बन जाए।
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अगस्त 2003 से, नाटो ने संयुक्त राष्ट्र-अनिवार्य अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएसएएफ) का नेतृत्व किया। तालिबान और अलकायदा के खिलाफ लड़ाई में आईएसएएफ इतिहास के सबसे बड़े गठबंधनों में से एक था और नाटो का अब तक का सबसे लंबा और सबसे चुनौतीपूर्ण मिशन था। मिशन के चरम पर 50 नाटो और साथी देशों के 130,000 से अधिक जवान वहां तैनात थे।


हालांकि,धीरे-धीरे सैनिकों की संख्या घटाई गई और पिछले साल तक वहां केवल चार हजार सैनिक रह गए थे। अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के मुताबिक साल 2010 से 2012 के बीच तालिबान से जंग पर सालाना खर्च 100 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक सरकार ने अफगानिस्तान पर अक्टूबर 2011 से लेकर सितंबर 2019 तक 778 अरब डॉलर खर्च किया था। अमेरिका ने अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों के हथियारों, उपकरणों और ट्रेनिंग पर करीब 65 खरब रूपये खर्च कर दिए।


क्या था मिशन का मकसद

इस मिशन का उद्देश्य ऐसी स्थितियां बनाना था जिससे अफगान सरकार पूरे देश में अपने अधिकार का प्रयोग कर सके और अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई करने के काबिल बन सके। साथ ही अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा बलों की क्षमता का निर्माण हो सके। दिसंबर 2014 में यह काम तब पूरा हुआ जब अफगान राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा बलों ने अपने देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी  खुद संभाल ली। 



 

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