चीन के द्वारा भारी मात्रा में खोजी सैटेलाइटों पर निवेश किया जा रहा है, उसकी दर्जनों सैटेलाइट वर्तमान समय में पृथ्वी के ऊपर चक्कर लगा रही है। वास्तव में, चीन का रक्षा को लेकर बनाई गई रणनीति में यह माना गया कि अंतरिक्ष एक सैन्य क्षेत्र है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सामरिक समर्थक बल द्वारा संचालित 75 से ज्यादा सैटेलाइट चीन के पास मौजूद हैं।
जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1995-96 में ताइवान के जलसंधि संकट के दौरान चीन को रोकने के लिए अपने विमानवाहक पोत वहां भेजे थे, तभी बीजिंग के नेताओं ने निर्णय ले लिया था कि वे ऐसे शक्तिशाली सिस्टम और हथियार विकसित करेंगे जो अमेरिकी सैन्य अस्त्रों को पता लगा सके और उनपर जोरदार हमला कर उन्हें पीछे धकेल सकें।
हालांकि, अमेरिका के नौसेना का वाहक 800 किमी प्रति दिन की रफ्तार से चलता है, तो चीन एक ऐसा सिस्टम बनाने में जुट गया था जो अमेरिका के इन हथियारों पर निशाने पर रख सकें और खतरा महसूस होने पर उनपर हमला कर सकें।
उसने अपने दुश्मनों पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट और रडार का प्रयोग करना शुरू किया। चीन द्वारा वर्तमान समय में अपने क्षेत्र से गुजरने वाले नौकायनों सहित अन्य विमानों पर इनकी मदद से पैनी नजर रखी जाती है।
चीन बड़ी संख्या में सेंसरों का प्रयोग करता है जिनसे दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और पूर्वी चीन सागर में संचालित हो रही नौकायानों पर नजर रखी जा सकें। इसके लिए चीन उपग्रहों, रडार, सतह पर तैनात युद्धपोतों और पनडुब्बियों, समुद्री गश्ती विमान और पानी के नीचे मौजूद सेंसरों का प्रयोग करता है। इतना ही नहीं, बल्कि चीन के हित अब पश्चिमी प्रशांत और हिंद महासागर में भी फैल रहे हैं।
सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम रिसर्च के निदेशक प्रोफेसर डेविड स्टुपल्स ने बताया कि 'दक्षिण चीन सागर में तनाव के कारण यहां सिग्नल इंटेलिजेंस गतिविधि की जरूरत हैं जो चीनी सैन्य उपस्थिति के द्वारा ही पूरी हो सकती है। चीन के आर्थिक विकास, सुरक्षा और प्रमुख विश्व शक्ति बनने के लिए इस तरह की सुरक्षा चीजों की जरूरत चीन के हितों के लिए जरूरी है।'