जानकारों के मुताबिक दुनिया में इस समय जो परमाणु रिएक्टर हैं, उनमें ज्यादातर दूसरी पीढ़ी के रिएक्टर हैं। कुछ तीसरी पीढ़ी के रिएक्टर भी चल रहे हैं। उनमें दो चीन के गुआंगदोंग प्रांत में हैं। ऐसा पहला रिएक्टर चीन के फुजियान प्रांत के फुचिंग में लगा था। इसे भी चीन के अंदर ही देसी तकनीक से तैयार किया गया था। इस रिएक्टर से इसी साल जनवरी में व्यापारिक तौर पर बिजली का उत्पादन चालू हो गया।
जानकारों के मुताबिक चौथी पीढ़ी के परमाणु ऊर्जा सिस्टम की खूबी यह है कि इसमें ईंधन कम लगता है और आर्थिक नजरिए से यह ज्यादा लाभदायक है। साथ ही इससे ऐसा रेडियोएक्टिव पदार्थ भी पैदा नहीं होता, जो लंबे समय तक नष्ट न हो। स्वीडन की अनुसंधान संस्था एनर्जिफोर्स्क के मुताबिक ऐसे रिएक्टर से रेडियो एक्टिव पदार्थ लीक होने जैसे हादसे होने की आशंकाएं कम रहेंगी। इलेक्ट्रिक पॉवर प्रोमोशन काउंसिल की परमाणु ऊर्जा संबंधी चीन शाखा के महासचिव वांग यिंगसु ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा- ‘इसमें कोई शक नहीं है कि चीन परमाणु तकनीक में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। अब चालू हुई तकनीक सबसे उन्नत तकनीक है और यह सिर्फ चीन के पास है।’
लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र कार्बन शून्यता के लक्ष्य को हासिल करने का बेहतर तरीका नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि इनका निर्माण महंगा होता है और उसमें बहुत समय लगता है। लंदन स्थित नीति संबंधी परामर्श देने वाली संस्था चैटहम हाउस में सीनियर रिसर्च फेलॉ एंटनी फ्रोगैट का कहना है- ‘संभवना इसी बात की है कि चीन परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाता रहेगा। लेकिन मेरी राय में कार्बन उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य अक्षय ऊर्जा अपनाने से ही पूरा होगा।’