थिंक टैंक सेंटर फॉर न्यू अमेरिकन सिक्युरिटी के इंडो-पैसिफिक प्रोग्राम में फेलॉ जैकब स्टोक्स ने इस संबंध में ब्रिटिश अखबार द गार्जियन से कहा- ‘यह महत्वपूर्ण कदम है, जिसका मकसद ताइवान के बलों की रक्षा क्षमता में सुधार करना है। लेकिन यह चीन को भड़काने वाला कदम नहीं है।’ ताइवान में अमेरिकी नौसैनिकों की मौजूदगी के बारे में इसके पहले भी खबर आई थी। तब ताइवान के नौसैनिक कमांड ने उसकी पुष्टि की थी। उसने इसे ताइवान और अमेरिकी सेना के बीच सामान्य आदान-प्रदान और ट्रेनिंग में सहयोग बताया था। लेकिन नवंबर 2020 में अमेरिकी अधिकारियों ने इस खबर को गलत तथ्यों पर आधारित ठहरा दिया।
ताजा खबर सामने आने के बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में अमेरिका से ताइवान को सैनिक मदद तुरंत रोकने की मांग की है। बयान में कहा गया- ‘चीन अपनी संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।’ चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स ने शुक्रवार को एक टिप्पणी में कहा कि ताइवान और अमेरिका के बीच किसी प्रकार के सैनिक संबंध का चीन मजबूती से विरोध करता है।
इस बीच गुरुवार को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने इस खबर की पुष्टि की कि उसने चीन संबंधी सूचनाएं जुटाने के लिए एक विशेष ‘मिशन सेंटर’ का गठन किया है। सीआईए के निदेशक विलियम बर्न्स ने कहा- ‘21वीं सदी में चीन सरकार अमेरिका के लिए सबसे अहम भू-राजनीतिक खतरा है।’ पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन घटनाओं को देखते हुए ऐसा लगता है कि हाल में अमेरिका और चीन के अधिकारियों की बातचीत के बाद तनाव घटने की जो संभवना जताई गई थी, उसमें ज्यादा दम नहीं है।