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ड्रैगन की चालबाजी: क्या चीन पहले से जानता था कि अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत आने वाली है?

Mon, 30 Aug 2021 07:49 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल

सार

चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने करीब एक महीने पहले ही तालिबान नेताओं के साथ बैठक में इस आतंकी संगठन को क्षेत्र की अहम सैन्य और राजनीतिक ताकत करार दे दिया था।
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चीन के विदेश मंत्री वांग यी और तालिबान का राजनीतिक चेहरा मुल्ला अब्दुल गनी बरादर (बाएं)। - फोटो : Social Media
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विस्तार
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अमेरिकी सेना की वापसी के साथ ही अफगानिस्तान में अब तालिबान की हुकूमत है। जहां दुनिया के अधिकतर देश इस कट्टरपंथी संगठन से बातचीत के रास्ते तलाश रहे हैं, वहीं यह तय माना जा रहा है कि पाकिस्तान और चीन को अफगानिस्तान में तालिबान के आने का सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। अपनी एक हालिया डिबेट में भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी इसका जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चीन इस हद तक तालिबान के पूरे समर्थन में है कि उसने आतंकी संगठन के प्रतिनिधियों को न्योता देकर अपने यहां बुलाया और तीन-चार दिन उनकी मेहमाननवाजी भी की।
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तालिबान के आने से क्यों उठी चीन को फायदे की बात?

सुब्रमण्यम स्वामी ने चीन में तालिबान को बुलाए जाने की जिस घटना का जिक्र किया है, वह करीब एक महीने पुरानी है। तब चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने खुद ही तालिबान के नेताओं का स्वागत किया था। इस दल में मुल्ला अब्दुल गनी बरादर भी शामिल था, जिसका तालिबान के शासन में अफगानिस्तान का अगला राष्ट्रपति बनना लगभग तय माना जा रहा है। वांग यी ने एक बैठक के दौरान तालिबान को क्षेत्र की एक अहम सैन्य और राजनीतिक ताकत तक करार दे दिया था।

जब चीन ने तालिबानी नेताओं को न्योता भेजा था, तब यह संगठन अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिक कम होने के चलते अफगान सेना से लड़ रहा था। तालिबान ने अपने नेताओं के चीन जाने तक अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत के अलावा पाकिस्तान से लगे स्पिन बोलदाक पर धावा बोलकर कब्जा जमा लिया था। इस स्थिति को देखने के बाद माना जा रहा था कि तालिबान कुछ ही महीनों में काबुल तक पहुंच जाएगा। हालांकि, खुफिया एजेंसियों का यह अनुमान तब गलत साबित हुआ, जब तालिबान ने इन प्रांतों के घेरने के महज 15 दिन के अंदर काबुल पर नियंत्रण हासिल कर लिया। 

तालिबान के साथ चीन के कैसे होंगे रिश्ते?

अफगानिस्तान में सत्ता में आते ही तालिबान के साथ चीन के रिश्ते दो हिस्सों में हो सकते हैं। पहले तो वाणिज्यिक और दूसरे कूटनीतिक। 

1. वाणिज्यिक
चीन अपने आर्थिक हितों को साधते हुए अफगानिस्तान में व्यापार को खड़ा करने की कोशिश करेगा। माना जा रहा है कि इसमें उसे तालिबान का भी समर्थन हासिल होगा, क्योंकि अफगानिस्तान को आगे ले जाने के लिए उसे भी निवेश के जरिए मिलने वाले राजस्व की जरूरत होगी। ऐसे में दोनों ही ताकतें एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करेंगी। 

2. कूटनीतिक
चीन और तालिबान के बीच इस तरह के रिश्ते कई चीजों पर निर्भर करेंगे। पहला दोनों का एक-दूसरे के मामले में दखल न देना। चीन चाहेगा कि तालिबान उसके सबसे संवेदनशील शिनजियांग प्रांत (जिसकी सीमा अफगानिस्तान से लगती है) में कट्टरपंथ को बढ़ावा देने की कोशिश न करे और उइगुर मुस्लिमों के उत्पीड़न के मुद्दे को लेकर चीन सरकार पर सवाल न उठाए। उधर, तालिबान चाहेगा कि चीन उसके मानवाधिकार से जुड़े उल्लंघनों पर चर्चा न करे। खासकर शरिया कानून के नियमों के लागू होने के बाद महिला अधिकारों के उल्लंघन पर। अगर यह दोनों जरूरतें पूरी होती हैं, तो चीन आगे अफगानिस्तान में अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना को भी आगे बढ़ा सकता है। इससे उसे पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान की जमीन के भौगोलिक फायदे मिलेंगे और भारत को घेरने में उसे खासी आसानी होगी। 
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चीन-तालिबान के रिश्तों पर क्या था स्वामी का पूरा बयान?

चीन पूरी तरह तालिबान के समर्थन में है। तालिबान का एक प्रतिनिधिमंडल जब चीन गया था, तब यह दल वहां तीन-चार दिन तक रुका था। इस दल में जाने वालों में तालिबान का वह नेता (बरादर) भी शामिल था, जो कि वहां का अगला राष्ट्रपति बन सकता है। उनके साथ चीन की पूरी चर्चा हुई थी। जहां तक अफगानिस्तान की बात है, तो चीन उसका पूरा इस्तेमाल करेगा। उसकी बेल्ट एंड रोड परियोजना के लिए अफगानिस्तान काफी अहम है। चीन काफी शांत है, लेकिन अफगानिस्तान में जगह बनाने को लेकर वह काफी सफल रहा है। 
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