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BRICS: पांच साल बाद मोदी-जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता; पीएम ने सीमा पर शांति को बताया रिश्तों के लिए अहम

Wed, 23 Oct 2024 06:35 PM IST
निर्मल कांत वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कजान (रूस)

सार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को यहां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता की, जो मई 2020 में पूर्वी लद्दाख सीमा विवाद पैदा होने के बाद दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर पहली बैठक है।
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नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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गलवां संघर्ष के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ पहली द्विपक्षीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो-टूक कहा कि सीमा पर शांति व स्थायित्व बनाए रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। दोनों देशों के स्थिर, पूर्व-अपेक्षित और सौहार्दपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों का वैश्विक शांति और समृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। वहीं, जिनपिंग ने कहा कि भारत-चीन को संबंधों को सामान्य बनाए रखने के लिए एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना चाहिए। तब ही दोनों देश अपने विकास के लक्ष्यों को हासिल कर पाएंगे।

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के इतर बुधवार को इस मुलाकात में पीएम मोदी ने चीनी राष्ट्रपति से कहा कि हम पांच साल बाद औपचारिक रूप से बैठक कर रहे हैं। पिछले चार वर्षों से सीमा पर जारी तनाव दूर करने के लिए बनी सहमति का हम स्वागत करते हैं। भारत और चीन के संबंधों का महत्व केवल हमारे लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक शांति, स्थिरता और प्रगति के लिए भी बहुत अहम हैं। परस्पर विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता द्विपक्षीय संबंधों का मार्गदर्शन करेगी।

दोनों नेताओं की करीब 50 मिनट चली वार्ता ऐसे वक्त में हुई है, जब एक दिन पहले ही पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत-चीन ने अपनी सेनाओं की गश्त बहाली का समझौता किया है। चार साल से जारी गतिरोध खत्म करने की दिशा में इसे बड़ी सफलता माना जा रहा है। इससे पहले, दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक 2019 ब्रासिलिया में ब्रिक्स सम्मेलन में हुई थी। वहीं, देर रात पीएम मोदी देश लौट आए।  
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सहयोग व संपर्क अहम : जिनपिंग
राष्ट्रपति जिनपिंग ने मुलाकात में कहा कि दोनों पक्षों के लिए अहम है कि वे ज्यादा से ज्यादा संपर्क में रहें, सहयोग करें, आपसी मतभेदों और असहमतियों को उचित रूप से संभालें और परस्पर विकास आकांक्षाओं को पूरा करने में मदद करें। यह भी अहम है, दोनों पक्ष अपने वैश्विक दायित्व निभाएं, विकासशील देशों की ताकत और एकता को बढ़ावा देने के लिए मिसाल पेश करें। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बहु-ध्रुवीकरण व लोकतंत्र को बढ़ावा देने में सहयोग दें।

मोदी के सुझावों पर जिनपिंग सहमत
जिनपिंग ने रिश्ते सुधारने के मोदी के सुझाव से सैद्धांतिक सहमति जताई है। चीनी सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, जिनपिंग ने कहा, चीन व भारत जैसे विशाल पड़ोसी देशों को विकास व सौहार्द के लिए सही और उज्ज्वल राह की तलाश करनी चाहिए। दोनों देशों को परस्पर समझ बढ़ाने की जरूरत है कि हम एक-दूसरे के विकास के लिए अवसर हैं, न कि खतरा। हम सहयोगी साझेदार हैं, न कि प्रतिस्पर्धी। शिन्हुआ ने दावा किया, दोनों नेता सहमत थे कि दोनों देश समग्र रिश्तों पर असर डालने वाले खास मतभेदों को दूर करेंगे। जिनपिंग-मोदी ने माना कि उनकी बातचीत सकारात्मक व व्यापक महत्व की थी।

एक-दूसरे के हितों और चिंताओं का ध्यान रखने पर जोर
पीएम मोदी और जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि दोनों नेताओं ने रणनीतिक और दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की। दोनों नेताओं का मानना था, दुनिया के दो बड़े राष्ट्रों भारत और चीन के बीच स्थिर द्विपक्षीय संबंधों का पूरी दुनिया पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। दोनों ने जोर दिया कि परिपक्वता और बुद्धिमत्ता के साथ और परस्पर हितों, चिंताओं और आकांक्षाओं के लिए सम्मान दिखाकर, दोनों देश शांतिपूर्ण, स्थिर और लाभकारी द्विपक्षीय संबंध बना सकते हैं।

मिस्री ने बताया, सरहदी क्षेत्रों में शांति व अमन-चैन की बहाली हमारे द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की राह पर लौटने के लिए जगह बनाएगी। दोनों देशों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर भी बहुत सार्थक बातचीत हुई। आखिर में, पीएम मोदी ने अगले वर्ष चीन की एससीओ अध्यक्षता के लिए भारत के पूर्ण समर्थन का आश्वासन भी दिया।

उच्च स्तर पर बातचीत जल्द
मिस्री ने बताया कि दोनों देश द्विपक्षीय वार्ता तंत्र का उपयोग कर रणनीतिक संवाद बढ़ाने और रिश्तों को स्थिर करने के लिए अगला कदम उठाएंगे। विशेष प्रतिनिधि सीमा क्षेत्रों में शांति व सौहार्द के प्रबंधन की देखरेख करेंगे। सीमा से जुड़े मुद्दों के निष्पक्ष व स्वीकार्य समाधान के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच जल्द ही उच्चस्तरीय बैठक होगी। द्विपक्षीय वार्ता तंत्र 2003 में बना था। यह तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की सोच थी, तब विदेश मंत्रालय भी उनके पास था। 
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