बीजिंग में 2022 में होने वाले शीतकालीन ओलंपिक से पहले चीन को एकऔर झटका लगा है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बाद अब कनाडा ने भी चीन की राजधानी बीजिंग में आयोजित होने वाले शीतकालीन ओलंपिक खेलों के राजनयिक बहिष्कार का एलान किया है। बुधवार को कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से इसकी जानकारी दी।
कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो ने कहा कि चीन में लगातार हो रहे मानवाधिकार के उल्लंघन से कनाडा काफी चिंतित है। इसके विरोध में हम बीजिंग में आयोजित होने वाले शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों में किसी भी राजनयिक प्रतिनिधि को नहीं भेजेंगे। जस्टिन ट्रूडो ने आगे कहा कि हम ओलंपिक खेलों में भाग लेने वाले अपने खिलाड़ियों का पूरा समर्थन करेंगे।
अमेरिका में चीनी मानवाधिकार मुद्दों पर आईओसी की निंदा का विधेयक पारित
अमेरिकी संसद के निचले सदन (प्रतिनिधि सभा) ने चीन संबंधी मुद्दों पर मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं का पालन करने में नाकाम रहने के लिए अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) की निंदा के प्रस्ताव को मंजूरी दी। अमेरिकी अखबार द हिल की रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्ताव को 428 मत मिले जबकि विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा। प्रस्ताव में आईओसी से मांग की गई है कि वह चीनी टेनिस स्टार पेंग द्वारा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र व पारदर्शी जांच शुरू करने के लिए चीन सरकार से अपील करे।
शिनजियांग से आयात रोकने का बिल पास
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने चीन के शिनजियांग से आयात रोकने के लिए एक और विधेयक पारित किया। इसमें अल्पसंख्यक समुदाय को सताने के लिए जिम्मेदार चीनी अफसरों के खिलाफ जबरन श्रम कराने के खिलाफ कदम शामिल हैं। यह बिल बीजिंग ओलंपिक के कूटनीतिक बहिष्कार की घोषणा के कुछ दिन बाद आया है, जिसका मकसद उइगरों के जबरन श्रम से बने सामान का अमेरिका में इस्तेमाल रोकना है।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी कर चुके हैं एलान
कनाडा से पहले मंगलवार को ऑस्ट्रेलिया और इससे पहले अमेरिका भी बीजिंग में होने जा रहे शीतकालीन ओलंपिक के बहिष्कार का एलान कर चुके हैं। इसके पीछे चीन के शिनजियांग प्रांत में उईगर मुस्लिमों पर अत्याचर और अन्य कई मानवाधिकार उल्लंघनों का हवाला दिया गया है। दोनों देशों ने ओलंपिक में भाग ले रहे अपने खिलाड़ियों को अपना समर्थन दिया है, लेकिन अपने किसी भी राजनयिक को न भेजने का फैसला किया है।
कई और देश कर सकते हैं बहिष्कार
बीजिंग में होने जा रहे शीतकालीन ओलंपिक में केवल दो महीने शेष हैं। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के अलावा ब्रिटेन भी खेलों के बहिष्कार पर विचार कर सकता है। इन देशों द्वारा यह कदम अपने एथलीटों को प्रतिस्पर्धा करने से रोके बिना विश्व मंच पर चीन को एक कड़ा संदेश भेजने की कोशिश मानी जा रही है।
पहले भी हो चुका है बहिष्कार
इससे पहले भी कई बार ओलंपिक खेलों ने विभिन्न देशों द्वारा बहिष्कार या कम देशों की भागीदारी को झेला है। वर्ष में 1956 (मेलबर्न), 1964 (टोक्यो), 1976 (मॉन्ट्रियल), 1980 (मॉस्को), 1984 (लॉस एंजिल्स) और 1988 (सियोल) में युद्ध, आक्रमण और रंगभेद जैसे कारणों से विभिन्न देशों ने ओलंपिक खेलों का बहिष्कार किया था।
मानवाधिकार समूह ने किया स्वागत
चीन में मानवाधिकार निगरानी समूह की निदेशक सोफी रिचर्डसन ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने इसे उइगर और अन्य अल्पसंख्य समुदायों को लक्षित मानवता के खिलाफ चीनी सरकार के अपराधों को चुनौती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। बता दें, बीजिंग ने इस्लामी चरमपंथ कम करने के मकसद से इन शिविरों को व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों का नाम दिया है।
चीन बौखलाया, कहा- पहाड़ नदी का रास्ता नहीं रोक सकता
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीजिंग ओलंपिक खेलों के राजनयिक बहिष्कार के फैसले से चीन बौखला उठा है। उसने कहा, दुनिया में कोई भी पहाड़ नदी को समुद्र में बहने से नहीं रोक सकता है। ऑस्ट्रेलिया में चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा, चीन-ऑस्ट्रेलिया रिश्तों की मौजूदा दुर्दशा की जिम्मेदारी पूरी तरह से ऑस्ट्रेलियाई पक्ष पर है। यह फैसला दोनों देशों में सुधार की उम्मीदों के एकदम उलट है।