आरोप है कि हंगरी सरकार एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों को बच्चों के यौन शोषक और असामान्य नागरिकों के रूप में पेश कर रही है। ऑर्बान की फिडेस्ज पार्टी ने एलजीबीटीक्यू समुदाय के खिलाफ लाए गए बिल को बाल यौन शोषण निरोधक बिल के रूप में पेश किया। उससे विपक्षी दलों के लिए उसका विरोध करना मुश्किल हो गया। फिडेस्ज पार्टी ने एलजीबीटीक्यू और बाल यौन शोषकों को एक जैसा ही दिखाने की कोशिश की है।
हंगरी के नए कानून का यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने कड़ा विरोध किया था। कई देशों के नेताओं ने कहा कि ऐसे कानूनों के साथ हंगरी ईयू का सदस्य बना नहीं रह सकता, लेकिन मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि हंगरी ऐसा कदम उठाने वाला अकेला देश नहीं है। बल्कि एलजीबीटीक्यू अधिकारों को संकुचित करने की कोशिश दुनिया के कई हिस्सों में हो रही है।
पहले जहां मान्यता थी, वहां अब अधिकारों को चुनौती दी जा रही
इंटरनेशनल लेस्बियन, गे, बाइ सेक्सुअल, ट्रांस एंड इंटरसेक्स एसोसिएशन की यूरोप शाखा की कार्यकारी निदेशक एवलिन पैराडिस ने कहा है- ‘बहुत से देशों में इस समय प्रतिगामी कदम उठाए जा रहे हैं। जिन अधिकारों को पहले मान्यता मिल गई थी, उन्हें अब चुनौती दी जा रही है।’
दूसरे विशेषज्ञों का भी कहना है कि एलजीबीटीक्यू अधिकारों पर हमला सिर्फ यूरोप की परिघटना नहीं है। बेल्जियम में यूनिवर्सिटी ऑफ एंटवर्प में यूरोपीय उसूल विभाग की अध्यक्ष हेलीन टौके के मुताबिक उग्र राष्ट्रवादी और धुर दक्षिणपंथी आंदोलन अक्सर एलजीबीटीक्यू विरोधी भावनाएं फैलाते हैं। अपनी पहचान स्थापित करने और अपने लोगों की श्रेष्ठता जताने के लिए वे ऐसे लोगों की तलाश करते हैं, जिन्हें वे खुद से नीचा बता सकें। शरणार्थियों, एलजीबीटी लोगों और ट्रांस महिलाओं ऐसे समुदाय के रूप में चुना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्वी यूरोप में जब कम्युनिस्ट शासन था, तब वहां एलजीबीटीक्यू लोगों को काफी अधिकार मिले हुए थे। लेकिन अब दक्षिणपंथी ताकतों ने माहौल बदल दिया है। हाल में अमेरिकी संस्था पिउ रिसर्च सेंटर के एक सर्वे से सामने आया कि जहां पश्चिमी यूरोप में समलैंगिक विवाहों के लिए भारी जन समर्थन है, वहीं पूर्व यूरोप में जनमत इसके खिलाफ है। पूर्वी यूरोप में सिर्फ चेक रिपब्लिक ऐसा देश है, जहां अभी भी ज्यादातर लोग समलैंगिक विवाह के अधिकार का समर्थन करते हैँ।