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अमेरिका-चीन टकराव: ऑकुस के साथ ऑस्ट्रेलिया ने चुन लिया है अपना पक्ष

Fri, 17 Sep 2021 03:39 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कैनबरा

सार

विश्लेषकों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया का ये कदम खुद उसे नुकसान पहुंचाने वाला साबित हो सकता है। इसकी एक वजह यह है कि व्यापार संबंधों में चीन का नजरिया ऑस्ट्रेलिया के प्रति अब और आक्रामक हो जाएगा। इसका उसे नुकसान होगा। दूसरी तरफ सुरक्षा क्षेत्र में अब ऑस्ट्रेलिया की अमेरिका पर निर्भरता और बढ़ गई है...
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स्कॉट मॉरिसन और शी जिनपिंग - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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अमेरिका और चीन में जारी टकराव के बीच ऑस्ट्रेलिया ने अब अपना पक्ष चुन लिया है। काफी समय तक ऑस्ट्रेलिया में ये दुविधा रही कि इस टकराव के बीच उसका रुख क्या हो। लेकिन नए त्रिगुट (ऑकुस-ऑस्ट्रेलिया-यूनाइटेड किंगडम-यूनाइटेड स्टेट्स: एयूकेयूएस) का हिस्सा बन कर अब उसने खुल कर अमेरिका के साथ जाने का फैसला कर लिया है। ऑकुस के लिए हुए समझौते करे तहत अमेरिकी तकनीकी मदद से ऑस्ट्रेलिया में आठ परमाणु अस्त्र क्षमता से लैस पनडुब्बियां बनाई जाएंगी।

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ऑस्ट्रेलिया के इस फैसले स्वाभाविक रूप से उसके प्रति चीन का गुस्सा और भड़क उठा है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया का ये कदम खुद उसे नुकसान पहुंचाने वाला साबित हो सकता है। इसकी एक वजह यह है कि व्यापार संबंधों में चीन का नजरिया ऑस्ट्रेलिया के प्रति अब और आक्रामक हो जाएगा। इसका उसे नुकसान होगा। दूसरी तरफ सुरक्षा क्षेत्र में अब ऑस्ट्रेलिया की अमेरिका पर निर्भरता और बढ़ गई है।

इन विश्लेषकों के मुताबिक अतीत में ऑस्ट्रेलिया की अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बना कर चलने की नीति से उसे बहुत लाभ हुआ था। 2003 में लगातार दो दिन ऐसे आए, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिनताओ ने ऑस्ट्रेलियाई संसद को संबोधित किया था। आंकड़ों से जाहिर है कि चीन के साथ व्यापार संबंधों से ऑस्ट्रेलिया को खूब फायदा हुआ। साल 2000 में ऑस्ट्रेलिया ने चीन को 3.6 अरब डॉलर की वस्तुओं का निर्यात किया था। 2015 में ये मात्रा बढ़ कर 74 अरब डॉलर के बराबर हो गई।
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लेकिन 2017 में ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल ने आरोप लगाया कि चीन ऑस्ट्रेलिया की घरेलू राजनीति में दखल दे रहा है। तब से उसके चीन के साथ संबंध बिगड़ने का दौर शुरू हुआ। 2020 में जब ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जांच की मांग उठाई, तब ये संबंध काफी तनावपूर्ण हो गए। तब चीन ने ऑस्ट्रेलिया से कोयला, शराब, जौ और बीफ के आयात में कटौती कर दी। उसका नुकसान ऑस्ट्रेलियाई अर्थव्यवस्था को हुआ। अब ऑकुस समझौते पर दस्तखत के साथ तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया है।

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ऑकुस समझौते पर नाराजगी भरी प्रतिक्रिया जताते हुए चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने गुरुवार को कहा कि चीन-ऑस्ट्रेलिया संबंधों आई गिरावट के लिए पूरी तरह से ऑस्ट्रेलिया जिम्मेदार है। ऑस्ट्रेलियन की नेशनल यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता युन जियांग ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘ऑस्ट्रेलिया-चीन संबंधों के ताबूत में अब आखिरी कील ठोक दी गई है। अब कम से कम निकट भविष्य में दोनों देशों के बीच मेलमिलाप की कोई संभावना नहीं है।’

कुछ अन्य विश्लेषकों ने भी राय जताई है कि ऑकुस करार के साथ अब बात वहां पहुंच गई है, जहां से वापस लौटना संभव नहीं है। ऑस्ट्रेलिया की नेशनल यूनिवर्सिटी के नेशनल सिक्युरिटी कॉलेज के प्रमुख रोरी मेडकाफ ने कहा है- ‘इस समझौते के साथ ऑस्ट्रेलिया ने संकेत दिया है कि वह चीन के साथ रिश्तों के मामले में अब पीछे मुड़ कर नहीं देखना चाहता। अधिक से अधिक वह प्रतिस्पर्धा भरे सह-अस्तित्व की उम्मीद अब कर रहा है।’

लेकिन कुछ विशेषज्ञों की राय है कि ऐसी राह तय करने वाला ऑस्ट्रेलिया अकेला देश नहीं है। ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट के फेलॉ रिचर्ड मैकग्रेगॉर ने कहा है कि भारत और जापान भी क्वैड (चौगुट) में शामिल हो कर बाइडन प्रशासन के साथ मिल कर चीन के उदय को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं।
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