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अमेरिका: तालिबान का समर्थन करने वाली सरकारों पर प्रतिबंध लगाने का विधेयक पेश, पाकिस्तान भड़का

Wed, 29 Sep 2021 10:16 PM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

'अफगानिस्तान काउंटर टेररिज्म, ओवरसाइट एंड एकाउंटेबिलिटी एक्ट' को सीनेटर जिम रिश ने पेश किया। यह विधेयक 2001-2020 के बीच तालिबान को समर्थन देने में पाकिस्तान की भूमिका, जिसके कारण अफगानिस्तान की सरकार गिरी... साथ ही पंजशीर घाटी पर तालिबान के हमले में पाकिस्तान के समर्थन के बारे में विदेश मंत्री से एक रिपोर्ट की मांग करता है।
 
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तालिबान (फाइल) - फोटो : ANI
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विस्तार
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अमेरिका के 22 रिपब्लिकन सीनेटर के एक समूह ने मंगलवार को अफगानिस्तान में तालिबान और उसका समर्थन करने वाली सभी विदेशी सरकारों पर प्रतिबंध लगाने का विधेयक पेश किया। जिम रिश ने सीनेट के पटल पर विधेयक पेश करने के बाद कहा, ‘‘ हम अफगानिस्तान से अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन की बेतरतीब वापसी के गंभीर प्रभावों पर गौर करना जारी रखेंगे। ना जाने कितने ही अमेरिकी नागरिकों और अफगान सहयोगियों को अफगानिस्तान में खतरे के बीच छोड़ दिया गया। हम अमेरिका के खिलाफ एक नए आतंकवादी खतरे का सामना कर रहे हैं, वहीं अफगान लड़कियों और महिलाओं के अधिकारों का हनन करते हुए तालिबान गलत तरीके से संयुक्त राष्ट्र से मान्यता चाहता है।’’ हालांकि पाकिस्तान ने अमेरिकी सीनेटर के इस कदम का विरोध किया है। 

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तालिबान अब तक अल-कायदा से नहीं हुआ अलग 
अमेरिका के एक शीर्ष सैन्य जनरल ने कहा कि तालिबान 2020 के दोहा समझौते का सम्मान करने में विफल रहा है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संगठन अभी तक अल-कायदा से अलग नहीं हुआ है। यूएस ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ’ के अध्यक्ष जनरल मार्क मिले ने सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति के सदस्यों से कहा, ‘दोहा समझौते के तहत, तालिबान द्वारा कुछ शर्तों को पूरा करने पर अमेरिका को सेना वापसी करनी थी, जिससे तालिबान और अफगानिस्तान की सरकार के बीच एक राजनीतिक समझौता हो पाए।’

उन्होंने कहा कि समझौते के तहत तालिबान को सात शर्तें और अमेरिका को आठ शर्तें पूरी करनी थी। मिले ने कहा, ‘‘ तालिबान ने अमेरिकी सेना पर हमला नहीं किया, जो कि एक शर्त थी, लेकिन वह दोहा समझौते के तहत किसी भी अन्य शर्त का पूरा करने में पूर्ण रूप से विफल रहा। वहीं शायद अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तालिबान कभी भी अल-कायदा से अलग नहीं हुआ या उनके साथ अपना संबंध नहीं तोड़ा।’’ अधिकारी ने कहा कि वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने अपनी सभी शर्तों को पूरा किया। यह स्पष्ट है कि अफगानिस्तान में युद्ध उन शर्तों पर समाप्त नहीं हुआ, जिन पर अमेरिका चाहता था। मिले ने एक सवाल के जवाब में कहा कि उनका मानना है कि अल-कायदा अफगानिस्तान में है और वे फिर एक साथ आना चाहते हैं।
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तालिबान और पाकिस्तान के संबंध तोड़ने में अमेरिका नाकाम
अमेरिका के एक शीर्ष सांसद ने कहा कि उनका देश तालिबान के लिए पाकिस्तान का समर्थन रोकने में नाकाम रहा और यह अफगानिस्तान में ‘‘अमेरिका की विफलता’’ की मुख्य वजहों में से एक है। सीनेटर जैक रीड ने कहा, ‘‘अमेरिकी सेना की वापसी और उसके आसपास की घटनाएं बाहरी प्रभावों से अलग नहीं थीं। इराक में जो कुछ हमारे साथ हुआ, तालिबान के लिए पाकिस्तान के समर्थन से निपटने में हमारी नाकामी और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किए गए त्रुटिपूर्ण दोहा समझौते ने अफगानिस्तान में हमारी असफलता की राह बनाई।’’

अफगान सरकार का नेतृत्व कर रहे आतंकी 
सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति के सदस्य सीनेटर जिम इनहोफ ने कहा कि अफगान सरकार का नेतृत्व अब आतंकवादी कर रहे हैं जिनका लंबे समय से अल-कायदा से संबंध रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘और हम अफगानिस्तान हवाई क्षेत्र में प्रवेश के लिए पाकिस्तान सरकार की दया पर निर्भर है। अगर हम वहां प्रवेश भी कर लें तो हम अफगानिस्तान में अल-कायदा पर हमला नहीं कर सकते क्योंकि हमें चिंता है कि तालिबान वहां मौजूद अमेरिकियों के साथ क्या करेगा।’’

सुनवाई के दौरान सीनेटर रीड ने कहा कि युद्ध के दौरान अमेरिका, तालिबान को पाकिस्तान से मिल रहे समर्थन से निपटने मे नाकाम रहा, यहां तक कि अमेरिकी राजनयिकों ने पाकिस्तानी नेताओं के साथ मुलाकात की और उसकी सेना ने आतंकवाद रोधी अभियान में सहयोग दिया।
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पाकिस्तान भड़का

अमेरिकी सीनेटरों द्वारा पेश किए गए मसौदा विधेयक के बारे में मीडिया के सवालों के जवाब में, इस्लामाबाद विदेश कार्यालय ने कहा कि मसौदा वॉशिंगटन में मीडिया और कैपिटल हिल दोनों में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी को लेकर चल रही बहस को लेकर एक प्रतिक्रिया जैसा नजर आता है। 

पाकिस्तान के संदर्भ में ये कानून पूरी तरह से अनुचित हैं। हम इसे 2001 से अफगानिस्तान पर पाकिस्तान-अमेरिका सहयोग की भावना विपरीत पाते हैं, जिसमें अफगान शांति प्रक्रिया की सुविधा और अफगानिस्तान से अमेरिकी और अन्य देशों के नागरिकों की हालिया निकासी शामिल हैं।  
 
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