अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान छोड़ते ही आतंकी सगंठन अल कायदा ने तालिबान को अफगानिस्तान पर जीत की बधाई भेज दी। आतंकी समूह के मीडिया विंग, अस-साहब पर यह बधाई संदेश प्रकाशित है। अल कायदा ने अफगानिस्तान पर तालिबान की जीत को 'यूरोप और पूर्वी एशिया में जनता के लिए अमेरिकी आधिपत्य की बेड़ियों से मुक्त होने का अवसर' बताया है। उसने कश्मीर, फिलिस्तीन, मघरेब (उत्तर पश्चिमी अफ्रीका) को "इस्लाम के दुश्मनों के चंगुल" से "मुक्ति" दिलाने की भी बात कही है।
अपने बधाई संदेश में अलकायदा ने कहा है कि "फिलिस्तीन को ज़ायोनी कब्जे से और इस्लामिक मगरेब को फ्रांसीसी कब्जे से मुक्त किया जाए। लेकिन चीन के शिनजियांग में मानवाधिकारों के हनन के बारे में उसने एक शब्द भी नहीं कहा है। जबकि उइगर मुसलमानों के मानवाधिकार हनन की खबरें अक्सर सुनने को मिलती हैं।
और क्या कहा है अलकायदा ने
अलकायदा ने तालिबान को भेजे बधाई में ‘इस्लामिक उम्माह को अफगानिस्तान में अल्लाह की दी गई आजादी मुबारक’ कहा है। इस संदेश में तालिबान ने लिखा है, ‘ओ अल्लाह, लेवंत, सोमालिया, यमन, कश्मीर और दुनिया के अन्य इस्लामी जमीनों को इस्लाम के दुश्मनों को आजाद कराओ। ओ अल्लाह, दुनिया भर में मुस्लिम कैदियों को आजादी दिलाओ।’अमेरिका का साम्राज्य तोड़ने के लिए अलकायदा ने ईश्वर की तारीफ की है और कहा है इस्लाम की धरती अफगानिस्तान पर उसे शिकस्त मिली है।
उइगर मुसलमानों पर क्यों चुप है अलकायदा
हैरानी की बात है कि दुनिया भर के मुस्लिम कैदियों की बात करने पर अलकायदा को उइगर मुसलमानों की याद नहीं आई है। उइगर मुसलमानों के बारे में अलकायदा के कुछ नहीं बोलने की वजह के बारे में रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल ए के सिवाच (रिटायर्ड) की राय यह है कि अलकायदा हों या तालिबान वे चीन से डरते हैं। क्योंकि चीन से न केवल उन्हें आर्थिक मदद मिलती है बल्कि हर तरह से उनको प्रोत्साहन मिलता है। चीन की वजह से इन आतंकी संगठनों के पास संसाधन की कोई कमी नहीं है।
वे कहते हैं इस सबके बदले में चीन अफगानिस्तान के संसाधनों का इस्तेमाल अपने हक में करना चाहता है। उसकी मंशा अफगानिस्तान के लीथियम पर पूरा कब्जा करने की है। वह अफगानिस्तान में भारी निवेश करने की योजनाएं बना रहा है, चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को वह ईरान तक ले जाना चाहता है। इस काम में उसे अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों की सरकारों का सहयोग चाहिए।
तालिबान ने चीन से उइगर मुसलमानों के बारे में बात नहीं करने का वादा किया है। इसलिए अलकायदा भी नहीं कर रहा है। अलकायदा का गढ़ अफगानिस्तान और पाकिस्तान है और पाकिस्तान और चीन मौसेरे भाई की तरह हैं। तालिबान के चीन के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं और अलकायदा के साथ भी। इसलिए तालिबान के हित को अलकायदा अपना हित समझता है। तालिबान ने ही अलकायदा को शह दिया था। 9/11 के बाद अलकायदा ने पाकिस्तान में शरण ले थी।
हालांकि सिवाच यह मानते हैं कि कश्मीर को लेकर अलकायदा ने जो बात की है, उससे भारत को चिंता करने की जरूरत है, क्योंकि इस बात की आशंका लगातार जताई जा रही है कि अलकायदा और तालिबान पाकिस्तान को फायदा पहुंचाने के लिए कश्मीर में अपने पैर पसार सकते हैं।