उधर बाइडन-शी वार्ता के बाद चीनी मीडिया में छपी टिप्पणियों के मुताबिक चीन इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि अमेरिका सचमुच चीन के साथ सहयोग करना चाहता है। टिप्पणियों में ध्यान दिलाया गया है कि राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद बाइडन के रुख से लगा था कि वे चीन से संबंध सुधारने को लेकर गंभीर हैं। लेकिन उनके प्रशासन का जो व्यवहार रहा है, उससे ये धारणा गलत साबित हुई है।
चीन के टीकाकारों का रुख लगातार सख्त बना हुआ है। फुदान यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर अमेरिकन स्टडीज की निदेशक वू शिनबो ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- अमेरिका ने चीन के बारे में रणनीतिक रूप से गलत आकलन किया है। उसकी राय बनी है कि चीन उसकी नेतृत्वकारी हैसियत को कमजोर करके अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर दबदबा कायम करना चाहता है। इसीलिए उसने चीन पर प्रतिबंध लगाए हैं।
वू ने कहा कि अमेरिका ने लगातार उन तीन बुनियादी बातों की अवहेलना की है, जिन्हें चीन बर्दाश्त नहीं कर सकता। ये तीन बातें हैं- ‘चीनी प्रकार के समाजवाद’ को चुनौती न दी जाए और उसे लांछित करने का प्रयास न किया जाए, चीन की संप्रभुता को सीमित करने और उसकी विकास प्रक्रिया में रुकावट डालने की कोशिश ना की जाए, और उसकी क्षेत्रीय अखंडता की अनदेखी ना की जाए।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि दोनों तरफ के रुख को देखते हुए नहीं लगता कि निकट भविष्य में अमेरिका और चीन के संबंधों में सुधार की कोई गुंजाइश बनेगी। बल्कि इस क्षेत्र में टकराव और बढ़ने की गुंजाइश मजबूत होती जा रही है।