अहमदजई कहते हैं कि तालिबान नेतृत्व ने शांति वार्ता और विदेश यात्राओं के दौरान भरोसा दिलाया था कि इस्लामी कानूनों के तहत महिलाओं को अधिकार हैं और उसकी अफगानिस्तान में हिंसा को कम करने की इच्छा है। समूह ने इसके अलावा सरकारी भवनों और सार्वजनिक जगहों की रक्षा का भी वादा किया है, जिन्हें वह अक्सर निशाना बनाता है। लेकिन अब नए कब्जे वाले क्षेत्रों में उनकी नीतियां ज्यादा कठोर हैं।
कट्टरपंथी को पुरानी व्यवस्था पर ही विश्वास
अफगान सरकार की एजेंसी स्वतंत्र प्रशासनिक सुधार और नागरिक सेवा आयोग का कहना है कि सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया गया है। तालिबान-नियंत्रित कई क्षेत्रों में सामाजिक सेवाओं को रोक दिया गया है। इससे करीब एक करोड़ तीस लाख लोग सार्वजनिक सेवाओं से वंचित हो गए हैं। ये सारे सुबूत बताते हैं कि तालिबान अब भी अमीरात की पुरानी व्यवस्था में ही विश्वास रखता है। इस व्यवस्था में एक अनिर्वाचित धार्मिक नेता या अमीर अंतिम निर्णय लेने वाला होता है। अहमदजई के अनुसार कोई भी उसके फैसलों को चुनौती नहीं दे सकता क्योंकि माना जाता था कि उसके पास खुदा की ओर से दिए गए दैवीय अधिकार हैं।
महिलाओं में बढ़ा तालिबान का खौफ
तालिबान के ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी चरमपंथी नीतियों के पुनरुद्धार ने कई शहरों में महिलाओं में डर बैठ गया है। सरकारी नियंत्रण वाले फरयाब की प्रांतीय राजधानी मैमाना में एक कार्यकर्ता सनम सादात ने कहा, मुझे चिंता है कि महिलाएं अतीत के काले दिनों में लौट सकती हैं, जब वह सिर्फ गृहिणी थीं। समाज, संस्कृति, राजनीति और यहां तक कि खेल में उनके भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था। जब तालिबान शहरों पर कब्जा कर लेगा तब महिलाओं का क्या होगा?