अफगानिस्तान में बचे हुए अमेरिकी सैनिकों की सितंबर में वापसी का एलान हो गया है। लंबे अरसे तक यहां मौजूद अंतरराष्ट्रीय फौज तालिबान से देश को बचाने में जुटी रही तो राजनीतिक-कूटनीतिक माध्यमों से शांति और स्थायित्व के प्रयास भी जारी रहे।
तालिबान का स्वरूप भले पहले जैसा न हो, पर विचारधारा वही
अफगानिस्तान तालिबान के लिए भी ढाई दशक पहले की तरह इस्लामी कानून लागू करना काफी हद तक असंभव है। फिर भी अफगानिस्तान में तालिबान के ट्रैक रिकॉर्ड, गृहयुद्ध की आशंका और सरकार की कमजोरियों के चलते चौतरफा भय है। अमेरिका की लंबी मौजूदगी के बावजूद आज भी वहां की सरकार व सेना बिना सहारे खड़ी नहीं रह सकती।
इसी हफ्ते आई अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान को किनारे रखने के लिए अफगानिस्तान में सरकार को काफी संघर्ष करना पड़ेगा। अनुमान इसलिए भी सही है क्योंकि 1996-2001 के दौरान तालिबान ने अफगानिस्तान में दुनिया की सबसे तानाशाही सत्ता स्थापित की थी।
विश्लेषक मानते हैं कि दो दशक बाद भी उसकी विचारधारा में कोई खास फर्क नहीं आया है। सामरिक विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका की वापसी के मद्देनजर कुछ ऐसे जरूरी सवाल हैं जिनका जवाब जाने बिना अफगानिस्तान आगे नहीं बढ़ पाएगा।
अफगानी महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर क्या असर होगा
भले ही तालिबान पुराने स्वरूप में मौजूद न हो और उसके नेताओं की बयानबाजी महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए संतुष्टिजनक नहीं है। कई तालिबानी वार्ताकार कह चुके हैं कि वे महिलाओं के हक का समर्थन सिर्फ इस्लामी कानून के तहत ही करते हैं।
स्वभावत: तालिबानी बेटियों की शिक्षा का समर्थन नहीं करते, जहां तालिबान ने सरकार से स्कूलों को लेकर समझौता किया है। वहां उसने सामाजिक विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषयों पर पाबंदी लगाकर धार्मिक शिक्षा जोड़ दी है। अल्पसंख्यकों को आज भी पाबंदियों में जीना पड़ा है। वे आज भी असुरक्षित महसूस करते हैं।
अमेरिका-तालिबान में फरवरी 2020 में हुए समझौते का क्या होगा?
इस समझौते के तहत तय हुई परिस्थितियों और समय के हिसाब से अमेरिका को अफगानिस्तान छोड़ना था। वहीं तालिबान को बदले में आतंकवादी और सरकार से वार्ताकारी कदम उठाने थे लेकिन इसकी पूरी तरह भरपाई नहीं हो पाई। भले ही देर में ही सही पर अमेरिका अपने वादे के अनुरूप अफगानिस्तान छोड़ रहा है।
तालिबान अफगान सरकार के साथ सत्ता साझेदारी स्वीकारेगा?
तालिबान काबुल में काबिज सरकार को अमेरिका और साथी देशों की कठपुतली मानता है। अधिकारी मानते रहे हैं कि तालिबान का इरादा साझेदारी के बजाय ताकत, खूनखराबे के बल पर सत्ता कब्जाना है।
मौजूदा सरकार और सुरक्षा बलों के लिए नई चुनौतियां क्या हैं?
काबुल में मौजूदा सरकार का अस्तित्व पूरी तरह अफगानी सेना पर निर्भर है। लेकिन, तालिबान खुद को उसके मुकाबले ताकतवर समझता है क्योंकि अतीत में वह उसे हरा चुका है और आगे भी ऐसा करने में सक्षम है।
अगर प्रतिकूल हालात में तालिबानी लड़ाके आगामी महीनों में हमला करते हैं तो अफगानी सुरक्षा बल आवश्यक अमेरिकी मदद के बिना ज्यादा देर तक नहीं टिक पाएंगे। राष्ट्रपति अशरफ गनी जब तक बाहरी मदद से अपनी सेना के खर्चे उठा सकते हैं, तब तक उनकी सरकार सुरक्षित है।
आईएस और अलकायदा दोबारा अमेरिका के लिए खतरा बन सकते हैं?
अमेरिकी एजेंसियों के मुताबिक, अफगानिस्तान की जमीन से अलकायदा या आईएस से अमेरिका को फौरी तौर पर कोई खतरा नहीं है। हालांकि अफगानी शोध समूह का कहना है अमेरिकी सेना की वापसी के कुछ वर्षों में दोनों संगठन अमेरिका के खिलाफ आतंकी गतिविधियां रच सकते हैं।