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आईएसआईएस खुरासान: तालिबान से भी है इसकी दुश्मनी, जानें कब, क्यों और कैसे बना?

Fri, 27 Aug 2021 02:13 AM IST
देव कश्यप वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल

सार

  • काबुल एयरपोर्ट के बाहर हुए दो आत्मघाती हमले के पीछे आतंकी संगठन आईएस (इस्लामिक स्टेट) का हाथ होने की बात सामने आई है
  • अफगानिस्तान में सरकार बनाने जा रहे तालिबान को सबसे ज्यादा खतरा आईएसआईएस से लग रहा है
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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अफगानिस्ता में तालिबान के कब्जे के बाद गंभीर स्थिति के बीच गुरुवार की शाम काबुल एयरपोर्ट के बाहर दो आत्मघाती हमले हुए हैं। विदेशी मीडिया के मुताबिक, दोनों हमलों में चार अमेरिकी मरीन कमांडो समेत कम से कम 60 लोगों की मौत हुई है। पांच अमेरिकी सैनिकों समेत 100 से ज्यादा लोगों के घायल होने की खबर है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने कहा है कि हमले में अमेरिकी नागरिक मारे गए हैं। इन बम धमाकों के के पीछे आतंकी संगठन आईएस (इस्लामिक स्टेट) का हाथ होने की बात सामने आई है।

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हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी जारी की थी कि आईएसआईएस के आतंकवादी काबुल एयरपोर्ट पर हमला करने की साजिश रच रहे हैं। इस चेतावनी के बाद अफगानिस्तान एयरपोर्ट पर सुरक्षा में तैनात अमेरिकी सैनिकों को पहले से भी ज्यादा अलर्ट कर दिया गया था। इस आतंकी हमले की चेतावनी को देखते हुए कई देशों ने अभी अपने लोगों को वहां से निकालने की योजना को भी रोक दिया था। बुधवार को काबुल स्थित यूएस एंबेसी की तरफ से एक सुरक्षा अलर्ट जारी करते हुए कहा गया था कि अमेरिकी, काबुल एयरपोर्ट के पास बने गेट से दूर रहें। सीएनएन न्यूज ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि काबुल एयरपोर्ट के बाहर जमा भीड़ के बीच इस्लामिक स्टेट बड़ी साजिश को अंजाम दे सकता है। आइए आपको बताते हैं कब, क्यों और कैसे बना आईएसआईएस...

कब बना आईएसआईएस- खुरासान?

1999 में स्थापित हुए आईएसआईएस को दुनिया ने 2014 के बाद से ही जानना शुरू किया। इससे पहले सीरिया, इराक या बाकी दूसरे देशों में इसका प्रभाव नहीं था।आईएसआईएस- खुरासान, आईएसआईएस की ही एक शाखा है जिसे जनवरी 2015 में तालिबान के पाकिस्तानी सहयोगी के असंतुष्ट सदस्यों द्वारा स्थापित किया गया था, इसे तालिबान और अमेरिका का कट्टर दुश्मन माना जाता है। खुरासान शब्द एक प्राचीन इलाके के नाम पर आधारित है, जिसमें कभी उज्बेकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईराक का हिस्सा शामिल हुआ करता था। वर्तमान में यह अफगानिस्तान व सीरिया के बीच का हिस्सा है।
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आईएसआईएस के खुरासान मॉड्यूल को 'खोरासान ग्रुप' के नाम से भी जाना जाता है। इस ग्रुप में अलग विचारधारा रखने वाले आतंकी संगठन अलकायदा से जुड़े लोग शामिल हैं। इस ग्रुप को मुख्य तौर पर सीरिया, खुरासान से चलाया जाता है। 

आईएसआईएस के जन्म की कहानी

आईएसआईएस की नींव 2006 में बगदादी ने रखी थी। एक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका इराक को सद्दाम हुसैन के चंगुल से आजाद करा चुका था। पर इस आजादी को हासिल करने के दौरान इराक पूरी तरह बर्बाद हो चुका था। अमेरिकी सेना के इराक छोड़ते ही बहुत से छोटे-मोटे गुट अपनी ताकत की लड़ाई शुरू करने लगे। उन्हीं में से एक गुट का नेता था अबू बकर अल बगदादी, अल-कायदा इराक का प्रमुख।वो 2006 से ही इराक में अपनी जमीन तैयार करने में लगा था, लेकिन तब ना उसके पास पैसे थे, ना कोई मदद और ना ही लड़ाके।

दरअसल अमेरिकी सेना 2011 में जब इराक से लौटी, तब तक वो इराकी सरकार को बर्बाद कर चुकी थी। सद्दाम मारा जा चुका था। इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से तबाह हो चुके थे और सबसे बड़ी बात ये कि वो इराक में खाली सत्ता छोड़ गए थे। संसाधनों की कमी के चलते तब बगदादी ज्यादा कामयाब नहीं हो पा रहा था। हालांकि इराक पर कब्जे के लिए तब तक उसने अल-कायदा इराक का नाम बदल कर नया नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक रख लिया था।

बगदादी ने सद्दाम हुसैन की सेना के कमांडर और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया. इसके बाद उसने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चेकप्वाइंट्स और रिक्रूटिंग स्टेशंस को बनाना शुरू किया। अब तक बगदादी के साथ कई हजार लोग शामिल हो चुके थे, पर फिर भी बगदादी को इराक में वो कामयाबी नहीं मिल रही थी। इराक से मायूस होकर बगदादी ने सीरिया का रुख करने का फैसला किया। सीरिया तब गृह युद्ध झेल रहा था। अल-कायदा और फ्री सीरियन आर्मी वहां के दो सबसे बड़े गुट थे।
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अमेरिका ने अनजाने में आईएस को दी थी ट्रेनिंग

पहले चार साल तक सीरिया में भी बगदादी को कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद उसने एक बार फिर से अपने संगठन का नाम बदल कर आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) कर दिया। जून 2013 को फ्री सीरियन आर्मी के जनरल ने पहली बार सामने आकर दुनिया से अपील की थी कि अगर उन्हें हथियार नहीं मिले तो वो बागियों से अपनी जंग एक महीने के भीतर हार जाएंगे। इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमेरिका, इस्राइल, जॉर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे, और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी थी। इन देशों ने सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइल, गोला-बारूद सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया और बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए। दरअसल जो हथियार फ्री सीरियन आर्मी के लिए थे, वो साल भर के अंदर आईएसआईएस तक जा पहुंचे क्योंकि तब तक आईएस फ्री सीरियन आर्मी में सेंध लगा चुका था। साथ ही सीरिया में फ्रीडम फाइटर का नकाब पहन कर भी आईएस ने दुनिया को धोखा दिया। इसी नकाब की आड़ में खुद अमेरिका तक ने अनजाने में आईएस के आतंकवादियों को ट्रेनिंग दे डाली।

आईएसआईएस- खुरसान ने पहले भी किए हैं कई आतंकी हमले
वरिष्ठ यूएस अधिकारयों की तरफ से कहा गया है कि एंबेसी के द्वारा यह चेतावनी जारी की गई है कि इस आतंकी हमले में आईएसआईएस- खुरासान की भूमिका हो सकती है। व्हाइट हाउस में अपने संबोधन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी कहा था कि 'हम जिस जमीन पर है वहां किसी भी दिन आईएसआईएस- खुरासान एयरपोर्ट को निशाना बना सकते हैं। वो हमारे सैनिकों को, गठबंधन के सैनिकों तथा निर्दोष नागरिकों को निशाना बना सकते हैं।' 

आईएसआईएस- खुरसान ने पहले भी अफगानिस्तान में कई आतंकी हमले किए हैं। इस आतंकी संगठन ने मई में काबुल में लड़कियों के एक स्कूल पर हुए घातक विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी, जिसमें 68 लोग मारे और 165 घायल हो गए थे। आईएसआईएस- खुरसान ने जून में ब्रिटिश-अमेरिकी हालो (HALO) ट्रस्ट पर भी हमला किया था, जिसमें 10 लोग मारे और 16 अन्य घायल हो गए थे। 

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि तालिबान और आईएसआईएस के बीच दुश्मनी है। अफगानिस्तान में हुकूमत स्थापित करने में जुटे तालिबान ने कई बार दावा किया है कि उसका आईएसआईएस से कोई संबंध नहीं है और वह अपनी जमीन पर इन आतंकियों को बर्दाश्त नहीं करेगा। आईएसआईएस ने 19 अगस्त को आधिकारिक बयान जारी कर कहा था कि तालिबान अमेरिका का पिट्ठू है। इस्लामिक स्टेट ने यह भी कहा था कि अफगानिस्तान में जो कुछ भी हुआ वो तालिबान नहीं, बल्कि अमेरिका की जीत है। क्योंकि तालिबान ने अमेरिका के साथ बातचीत कर इस सफलता को पाया है।

तालिबान को भीआईएसआईएस से खतरा
अफगानिस्तान में सरकार बनाने जा रहे तालिबान को सबसे ज्यादा खतरा आईएसआईएस से लग रहा है। अगर अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट का प्रभाव बढ़ता है तो इससे तालिबान का असर कम होगा। दूसरा, तालिबान अफगान धरती पर आईएसआईएस को रोककर दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश भी कर सकता है कि वह आतंकी संगठनों को अब पनाह नहीं दे रहा। हालांकि, इससे आईएसआईएस को अपने अस्तित्व का खतरा महसूस हो रहा है। डर को बेचने वाला यह आतंकी समूह हर हाल में तालिबान को नीचा दिखाने की कोशिश में जुटा है।
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