पर्यवेक्षकों का कहना है कि प्रमुख पार्टियों के नेताओं के बीच टीवी पर अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं में हुई चुनावी बहसों के बाद जनमत के रूझान में बदलाव आया है। कनाडा के क्यूबेक प्रांत में फ्रेंच भाषा बोली जाती है। इसलिए वहां चुनाव के समय नेताओं के बीच दोनों भाषाओं में आमने-सामने बहस होती है। सीबीसी के एक विश्लेषण में कहा गया है कि अभी जो रूझान सामने हैं, अगर 20 सितंबर को होने वाले मतदान में उसके अनुरूप ही नतीजे आए, तो देश की राजनीतिक सूरत में कोई बदलाव नहीं होगा। एक बार फिर से बाहरी समर्थन से ट्रुडो के नेतृत्व में अगली सरकार बनेगी। सीबीसी के मुताबिक ऐसा होने की संभावना 56 फीसदी है।
जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक मध्यावधि चुनाव कराने के ट्रुडो के फैसले को देश के ज्यादातर लोगों ने पसंद नहीं किया है। कोरोना महामारी के बीच उनके इस फैसले को लालची माना गया। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इसी वजह से शुरुआत में जनमत सर्वेक्षणों में लिबरल पार्टी पिछड़ी रही। लेकिन ज्यादातर लोग कंजरवेटिव पार्टी की सरकार नहीं चाहते। इसलिए चुनाव करीब आने के साथ ट्रुडो के लिए समर्थन बढ़ा है।
कनाडा में जन कल्याण संबंधी नीतियों पर लिबरल पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के बीच ज्यादा मतभेद नहीं हैं। उनके बीच मतभेद आव्रजन के मुद्दे पर है। इसमें भी आव्रजकों को कनाडा की नागरिकता देने पर दोनों पार्टियां सहमत हैं। सिर्फ इसकी प्रक्रिया को लेकर उनमें मतभेद है। लिबरल पार्टी इस प्रक्रिया को आसान रखना चाहती है। जबकि कंजरवेटिव पार्टी नागरिकता के लिए इंतजार की अवधि लंबी रखना चाहती है।