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अफगानिस्तान का अतीत: पहले रूस ने अपनी सेना भेजी, फिर अमेरिका ने सीआईए को भेजा और हालात बिगड़ते गए

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Mon, 16 Aug 2021 06:24 PM IST

सार

सोवियत संघ के जाने के बाद मुजाहिदीनों ने तालिबान नाम का संगठन बनाया। खास बात यह है कि इनको सोवियत सेनाओं से लड़ने के लिए हथियार और वित्तीय मदद अमेरिका और सऊदी अरब से मिली थी, जबकि पाकिस्तान खुफिया एजेंसियों का स्टेशन हुआ करता था।
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तालिबान प्रतिनिधिमंडल के सदस्य मुख्य वार्ताकार मुल्ला अब्दुल गनी बरादरी (मध्य) के साथ - फोटो : Agency (File Photo)
अफगानिस्तान में तालिबान ने लगभग सभी बड़े राज्यों पर कब्जा जमा लिया है। इस कट्टरपंथी आतंकी संगठन के राजधानी काबुल में घुसने के साथ ही अफगानिस्तान में अब तालिबान के शासन का एलान महज औपचारिकता भर ही रह गया है। इस बीच अमेरिका समेत अलग-अलग देशों ने अपने राजनयिकों को वापस बुलाना भी शुरू कर दिया है। ऐसे में यह जानना बेहद अहम है कि जिस अमेरिका की मदद से कभी तालिबान ने सोवियत संघ की सेनाओं को उखाड़ने में सफलता पाई थी, आखिर उसी संगठन की वजह से इस बार अमेरिका को जल्दबाजी में अफगानिस्तान क्यों छोड़ना पड़ा। 

कब अस्तित्व में आया तालिबान? 
तालिबान का पश्तो में मतलब होता है- छात्र। पहली बार इसका नाम 1990 के दशक में सामने आया। यह वह समय था, जब सोवियत संघ की सेनाएं अफगानिस्तान में लंबे समय तक कब्जा रखने के बाद मुजाहिदीनों से लड़ते हुए कमजोर पड़ चुकी थीं। बताया जाता है कि सोवियत संघ के जाने के बाद इन्हीं मुजाहिदीनों ने तालिबान नाम का संगठन बना लिया। खास बात यह है कि इन मुजाहिदीनों को सोवियत सेनाओं से लड़ने के लिए हथियार और वित्तीय मदद अमेरिका और सऊदी अरब से मिली थी, जबकि पाकिस्तान इस दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का स्टेशन हुआ करता था।
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तालिबान प्रतिनिधिमंडल के सदस्य मुख्य वार्ताकार मुल्ला अब्दुल गनी बरादरी (मध्य) के साथ - फोटो : Agency (File Photo)
अफगानिस्तान में तालिबान ने लगभग सभी बड़े राज्यों पर कब्जा जमा लिया है। इस कट्टरपंथी आतंकी संगठन के राजधानी काबुल में घुसने के साथ ही अफगानिस्तान में अब तालिबान के शासन का एलान महज औपचारिकता भर ही रह गया है। इस बीच अमेरिका समेत अलग-अलग देशों ने अपने राजनयिकों को वापस बुलाना भी शुरू कर दिया है। ऐसे में यह जानना बेहद अहम है कि जिस अमेरिका की मदद से कभी तालिबान ने सोवियत संघ की सेनाओं को उखाड़ने में सफलता पाई थी, आखिर उसी संगठन की वजह से इस बार अमेरिका को जल्दबाजी में अफगानिस्तान क्यों छोड़ना पड़ा। 

कब अस्तित्व में आया तालिबान? 
तालिबान का पश्तो में मतलब होता है- छात्र। पहली बार इसका नाम 1990 के दशक में सामने आया। यह वह समय था, जब सोवियत संघ की सेनाएं अफगानिस्तान में लंबे समय तक कब्जा रखने के बाद मुजाहिदीनों से लड़ते हुए कमजोर पड़ चुकी थीं। बताया जाता है कि सोवियत संघ के जाने के बाद इन्हीं मुजाहिदीनों ने तालिबान नाम का संगठन बना लिया। खास बात यह है कि इन मुजाहिदीनों को सोवियत सेनाओं से लड़ने के लिए हथियार और वित्तीय मदद अमेरिका और सऊदी अरब से मिली थी, जबकि पाकिस्तान इस दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का स्टेशन हुआ करता था।

आइए जानते हैं अफगानिस्तान में युद्ध, तालिबान और तख्तापलट के बारे में...

1979: अफगानिस्तान में युद्ध का एक नया दौर शुरू हुआ, जो आज तक जारी है। सउर क्रांति के तहत अफगानिस्तान की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने अफगान राष्ट्रपति मोहम्मद दाऊद खान की हत्या कर दी। इसके बाद आंतरिक विद्रोह का सामना करने वाली सरकार को चलाने के लिए सोवियत ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया।

1989: जैसे ही सोवियत संघ का विघटन हुआ, सेना पीछे हट गई। अफगान सेना को अमेरिकी नेतृत्व में विद्रोह का सामना करने के लिए छोड़ दिया गया। अमेरिकी खुफिया का एजेंसी का अनुमान है कि एक दशक तक चले युद्ध में करीब 15,000 से ज्यादा सोवियत सैनिक मारे गए। सोवियत संघ ने अफगानों के साथ सलाहकार रखे और सेना को फंडिंग जारी रखी।



1992: अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं के पूरी तरह लौटने और वहां हुए तख्तापलट के बाद अमेरिका ने अफगान मुजाहिदीनों को मदद भेजना बंद कर दिया। इसी दौरान देश में अलग-अलग संगठनों के बीच नियंत्रण को लेकर जंग छिड़ गई। 

1994: इस गृहयुद्ध के बीच ही पहली बार तालिबान का नाम सामने आया, जिसमें सोवियत से लड़ने वाले मुजाहिदीन शामिल रहे। माना जाता है कि यह वो समय था जब तालिबान को देश की जनता का भी समर्थन मिल गया था।

1995: गृहयुद्ध के दौरान तालिबान ने सितंबर 1995 में ईरान से सटे हेरात प्रांत पर कब्जा कर लिया और ठीक एक साल बाद राजधानी काबुल पर कब्जा कर के अफगानिस्तान को अपने नियंत्रण में ले लिया। 1998 तक तालिबान के पास पूरे देश के 90 फीसदी क्षेत्र पर कब्जा था। 

2001 में लौटा अमेरिका, पर मदद नहीं बदला लेने के लिए
अफगानिस्तान पर दुनिया की नजर एक बार फिर अमेरिका में हुए 9/11 हमलों के बाद लौटी। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने उस दौरान जो रिपोर्ट जारी की थीं, उसमें तालिबान पर आतंकी संगठन अल-कायदा और उसके सरगना ओसामा बिन-लादेन की मदद करने का आरोप लगा था।

7 अक्टूबर 2001: यह वो तारीख थी, जब अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता के खिलाफ युद्ध छेड़ा था। 

17 दिसंबर 2001: इसके बाद दिसंबर के पहले हफ्ते तक ही तालिबानी सत्ता पूरी तरह गिर गई। तालिबान के तत्कालीन नेता मुल्ला मोहम्मद उमर और ओसामा बिन-लादेन इस दौरान अफगानिस्तान की पकड़ से दूर रहे। कई और तालिबानी नेता इस दौरान कथित तौर पर पाकिस्तान के क्वेटा में जा छिपे।

20 मार्च 2003: अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए अपनी सेनाएं इराक भेजीं। अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक इराक रवाना हुए। तालिबान ने एक बार फिर प्रभाव बढ़ाना शुरू किया। 

27 मार्च 2009: पाकिस्तानी तालिबान की मदद से अफगानिस्तान में तालिबान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नई नीति का एलान किया। सीमाई इलाकों पर आतंकवाद को रोकने के लिए पाकिस्तान से ज्यादा सहयोग करने की मांग की। दिसंबर में अमेरिका ने 68,000 सैनिकों के ऊपर 30 हजार सैनिक अफगानिस्तान भेजे।

2 मई 2011: अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ओसामा बिन-लादेन के पाकिस्तान के ऐबटाबाद में मारे जाने का एलान किया। अमेरिकी सैनिकों और सीआईए जासूसों की टीम ने दिया हमले को अंजाम। इसी के एक महीने बाद ओबामा ने अफगानिस्तान में सेना कम करने के निर्देश दिए। 

27 मई 2014: ओबामा ने 2016 के अंत तक अफगानिस्तान से पूरी सेना वापस बुलाने का एलान किया। 

4 सितंबर 2014: नाटो एक संयुक्त बयान कर बताया कि अफगान सुरक्षा बल साल के अंत तक देश की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी संभालेंगे।अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन ने अफगानिस्तान में अपना अभियान खत्म किया, लेकिन अमेरिका ने अपनी लड़ाई जारी रखी।

21 अगस्त 2017: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अफगानिस्तान से जल्दबाजी में सेना की वापसी के खिलाफ चेतावनी दी। ट्रम्प ने कहा कि हम अफगानिस्तान में राष्ट्र निर्माण करने नहीं, बल्कि आतंकवादियों को मारने आए हैं।

7 सितंबर 2019: ट्रंप ने यूएस-तालिबान शांतिवार्ता को रद्द कर दिया, जिसे 2018 के अंत में शुरू किया गया था।

29 फरवरी 2020: ट्रंप ने तालिबान के साथ एक डील की, जिसके तहत 1 मई 2020 से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का वादा किया गया।

17 नवंबर 2020: पेंटागन ने ट्रम्प प्रशासन के अंतिम दिनों में अफगानिस्तान और इराक में सैनिकों के स्तर को 2,500 तक कम करने की योजना का एलान किया।

14 अप्रैल, 2021: राष्ट्रपति जो बाइडन ने घोषणा की कि अफगानिस्तान से पूरी सेना की वापसी 11 सितंबर तक पूरी हो जाएगी।

1 मई 2021: अमेरिका ने अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी शुरू की।

6 जुलाई 2021: अमेरिका ने बगराम एयरफील्ड को खाली कराया, जो 2001 के आक्रमण के बाद से देश का सबसे बड़ा सैन्य प्रतिष्ठान था।

6 अगस्त 2021: प्रांतीय राजधानियां तालिबान के हाथों में पड़ने लगीं।
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