गोंडा में इलाज की आस लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों के हिस्से में राहत कम, बेबसी ज्यादा आ रही है। करोड़ों रुपये से बना यह सरकारी अस्पताल आज मरीजों के लिए किसी प्राइवेट नर्सिंग होम से कम महंगा साबित नहीं हो रहा। चार दिनों में 4950 रुपये खर्च कर चुके एक तीमारदार की आंखों में झलकती लाचारी पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रही है। मेडिकल वार्ड में भर्ती जुगुनू को सांस लेने में तकलीफ है। 18 फरवरी से 21 फरवरी के बीच इलाज में 4950 रुपये खर्च हो गए। तीमारदार ने कांपती आवाज में जेब से नोट निकालकर दिखाया। “5000 रुपये लेकर आए थे भैया… ये देखिए, अब सिर्फ 50 रुपये बचे हैं। अधिकांश दवाएं और इंजेक्शन बाहर से खरीदने पड़े।” सरकारी अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद दवाओं के लिए मेडिकल स्टोर की दौड़ ने परिवार की कमर तोड़ दी है। इसी वार्ड में भर्ती राममनोहर यादव के बेटे रमेश यादव ने कहा कि “अभी तो भर्ती किए हैं, इलाज शुरू भी नहीं हुआ… 550 रुपये की दवाएं बाहर से लानी पड़ीं। अगर यही हाल रहा तो आगे कैसे चलेगा? मरीज सुनील के तीमारदार गिरधारी ने आरोप लगाया कि 24 घंटे के भीतर 830 रुपये की दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ीं। इतना ही नहीं, सरकारी दवाएं दिलाने के नाम पर दो बार 300-300 रुपये यानी 600 रुपये सुविधा शुल्क भी देना पड़ा। सरकारी अस्पताल में भी अगर पैसे देने पड़ें, तो गरीब कहां जाएगा? तीमारदार का यह सवाल पूरे सिस्टम पर भारी है। करीब 283 करोड़ रुपये की लागत से बने मेडिकल कॉलेज की इमारत भले भव्य हो, लेकिन व्यवस्थाएं कराह रही हैं। ओपीडी में लंबी कतारें, वार्ड में दवाओं की कमी और बाहर की महंगी दवाओं का बोझ—यह सब मिलकर मरीजों के जख्मों पर नमक छिड़क रहा है। खरगुपुर निवासी पूजा शुक्ला ओपीडी में दिखाने आई थीं। अधिकांश दवाएं बाहर से लिख दी गईं। निराश होकर बोलीं “अब नहीं आएंगे मेडिकल कॉलेज… गरीब आदमी इलाज कैसे कराए?। श्रीनिवास, जिनका पैर टूटा है, प्लास्टर दिखाते हुए बताते हैं।