आज सुबह जब दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल के बाहर हलचल तेज हुई, तो झारखंड से आई आशंका सच में बदल गई। अस्पताल के भीतर झारखंड की आत्मा मानी जाने वाली एक शख्सियत ने आखिरी सांस ली थी। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हो चुकी थी—“शिबू सोरेन नहीं रहे।”
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक संरक्षक और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का सोमवार सुबह 8:56 बजे दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया। वे पिछले एक महीने से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे और लंबे समय से किडनी संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे। अस्पताल प्रशासन के अनुसार डेढ़ महीने पहले उन्हें स्ट्रोक भी आया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं सोमवार सुबह सर गंगा राम अस्पताल पहुंचे और दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने अस्पताल से लौटने के बाद X (ट्विटर) पर लिखा-
“झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। दुख की इस घड़ी में उनके परिजनों से मिलकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। उनका पूरा जीवन जनजातीय समाज के कल्याण के लिए समर्पित रहा, जिसके लिए वे सदैव याद किए जाएंगे।”
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता के निधन की पुष्टि करते हुए X पर लिखा-
“आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं…”
वहीं, कल्पना सोरेन ने लिखा, “सब वीरान सा हो गया है… अंतिम जोहार आदरणीय बाबा… आपका संघर्ष, आपका स्नेह, आपका दृढ़ विश्वास - आपकी यह बेटी कभी नहीं भूलेगी।”
सोमवार शाम 6 बजे शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर विशेष विमान से झारखंड लाया जाएगा। सबसे पहले रांची के मोरहाबादी स्थित उनके आवास पर रखा जाएगा। मंगलवार सुबह आम जनता के अंतिम दर्शन के लिए झामुमो कार्यालय में रखा जाएगा। इसके बाद झारखंड विधानसभा में उन्हें अंतिम सम्मान दिया जाएगा। दोपहर 3 बजे उनके पैतृक गांव रामगढ़ जिले के नेमरा में अंतिम संस्कार किया जाएगा।
शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर 1980 में शुरू हुआ जब वे पहली बार लोकसभा सदस्य बने। उन्होंने संसद में लगातार आदिवासी मुद्दों को उठाया और झारखंड राज्य के गठन की दिशा में निर्णायक भूमिका निभाई। 15 नवंबर 2000 को जब झारखंड राज्य अस्तित्व में आया, तो यह दिशोम गुरु के नाम से प्रसिद्ध शिबू सोरेन की वर्षों की तपस्या का परिणाम था।
शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने—2005, 2008 और 2009 में। हालांकि, हर बार उनका कार्यकाल राजनीतिक अस्थिरता की वजह से छोटा रहा। बावजूद इसके उन्होंने आदिवासी कल्याण, ग्रामीण विकास और रोजगार पर विशेष ध्यान दिया। वे झारखंड के पहले ऐसे नेता बने जो जंगल, जमीन और जन के सवालों को सत्ता तक ले गए।
उनकी राजनीतिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए। हत्या और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों में उनका नाम आया, लेकिन जनता से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। कई मामलों में वे कोर्ट से बरी भी हुए, जिससे उनकी छवि पर स्थायी दाग नहीं लग सका।
आज जब झारखंड के ग्रामीण इलाकों में यह खबर पहुंची, तो कई जगह शोक सभाएं शुरू हो गईं। आदिवासी समुदायों में उन्हें “दिशोम गुरु” के नाम से पूजा जाता था। उनका जाना केवल एक नेता का नहीं, बल्कि एक युग का अंत है।