लोकसभा स्पीकर के खिलाफ लोकसभा में विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हो गया। यह प्रस्ताव कुछ विपक्षी सांसदों ने लोकसभा की कार्यवाही के संचालन और सदन में विपक्ष को पर्याप्त अवसर न मिलने के मुद्दे को उठाते हुए पेश किया था। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली। विपक्षी दलों का आरोप था कि सदन की कार्यवाही के दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर उन्हें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और कई बार उनके सवालों या स्थगन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया गया। इसी असंतोष के चलते विपक्ष के कुछ सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का फैसला किया। हालांकि जब इस प्रस्ताव को सदन में रखा गया तो इसे ध्वनि मत के जरिए खारिज कर दिया गया, क्योंकि सत्ता पक्ष के सांसदों की संख्या अधिक थी और उन्होंने प्रस्ताव का विरोध किया।
सदन में इस प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान विपक्षी सांसदों ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष का पद निष्पक्षता का प्रतीक होता है और उनसे उम्मीद की जाती है कि वे सभी दलों के सांसदों को समान अवसर दें। विपक्ष का कहना था कि हाल के समय में सदन की कार्यवाही के संचालन को लेकर कई बार सवाल उठे हैं, इसलिए वे इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी दर्ज कराना चाहते थे। दूसरी ओर सत्ता पक्ष के सांसदों ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया और कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ने हमेशा नियमों के अनुसार और निष्पक्ष तरीके से सदन की कार्यवाही का संचालन किया है। उनका कहना था कि विपक्ष राजनीतिक कारणों से अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहा है।
बहस के दौरान सत्ता पक्ष ने यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष का पद दलगत राजनीति से ऊपर होता है और इस पद की गरिमा बनाए रखना सभी सांसदों की जिम्मेदारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष इस तरह के प्रस्ताव लाकर संसद की कार्यवाही को बाधित करने की कोशिश कर रहा है। अंत में जब अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला लेने का समय आया तो इसे ध्वनि मत के लिए रखा गया। ध्वनि मत के दौरान सत्ता पक्ष के सांसदों की आवाज अधिक होने के कारण प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया और इस तरह लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव गिर गया।
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई। सत्ता पक्ष ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कहा कि सदन ने स्पष्ट रूप से अपना विश्वास लोकसभा अध्यक्ष में व्यक्त किया है। वहीं विपक्ष ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल सदन में निष्पक्षता और पारदर्शिता के मुद्दे को उठाना था। कुल मिलाकर यह घटनाक्रम संसद की कार्यवाही के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान को दर्शाता है, हालांकि ध्वनि मत से प्रस्ताव खारिज होने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि सदन का बहुमत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के साथ खड़ा है।