महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल देखने को मिला है। उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (यूबीटी) को बड़ा झटका देते हुए हिंगोली से सांसद नागेश पाटिल आष्टीकर ने साफ कर दिया है कि अब वह उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ हैं। पिछले कई दिनों से उनके पार्टी छोड़ने की अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन रविवार को सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो संदेश के जरिए उन्होंने पहली बार खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी।
नागेश आष्टीकर ने कहा कि उन्होंने अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया है। उन्होंने अपने फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि वह किसी दूसरी विचारधारा में नहीं गए हैं, बल्कि "एक शिवसेना से दूसरी शिवसेना" में आए हैं। उनके इस बयान ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
आष्टीकर ने दावा किया कि 18 जून तक उन्होंने और कुछ अन्य सांसदों ने कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया था। हालांकि, उसके बाद उनके खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों और बयानबाजी ने उन्हें यह कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि उनका इशारा शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत की ओर था।
दरअसल, हाल के दिनों में संजय राउत ने बागी सांसदों के खिलाफ तीखी टिप्पणी की थी और 'ऑपरेशन तुड़वा' की चेतावनी भी दी थी। आष्टीकर ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी को नाराजगी जाहिर करने का पूरा अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
नागेश आष्टीकर ने अपने फैसले के पीछे विकास कार्यों में आ रही बाधाओं को भी बड़ा कारण बताया। उन्होंने कहा कि विपक्ष में होने के कारण उनके संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य प्रभावित हो रहे थे। कार्यकर्ताओं और जनता के कई जरूरी काम नहीं हो पा रहे थे, जिससे उन पर लगातार दबाव बढ़ रहा था।
उन्होंने कहा कि सांसद निधि (एमपीलैड) के पांच करोड़ रुपये क्षेत्र के विकास के लिए पर्याप्त नहीं हैं। पिछले दो वर्षों में उन्होंने अपने लोकसभा क्षेत्र के लिए अतिरिक्त विकास निधि लाने के कई प्रयास किए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। ऐसे में जनता की अपेक्षाओं को पूरा करना मुश्किल हो रहा था।
हिंगोली सांसद ने कहा कि लोगों ने उन्हें बड़ी उम्मीदों के साथ संसद भेजा है और उनकी पहली जिम्मेदारी अपने क्षेत्र के विकास और जनता की सेवा करना है। इसी सोच के साथ उन्होंने यह फैसला लिया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह आगे भी अपने क्षेत्र के विकास और जनता के हितों के लिए काम करते रहेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के कुछ नेता उनके इस फैसले से नाराज हो सकते हैं, लेकिन समय के साथ वे उनकी मजबूरी और परिस्थितियों को समझेंगे। उनके मुताबिक, उनके पास यह कदम उठाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।
गौरतलब है कि 17 जून को दिल्ली में आयोजित शिवसेना (यूबीटी) की संसदीय दल की बैठक में छह सांसद शामिल नहीं हुए थे। इनमें संजय दिना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल आष्टीकर और ओमप्रकाश राजे निम्बालकर के नाम शामिल थे। इसके बाद से ही इन सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई थीं।
वर्तमान में लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के नौ सांसद हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कम से कम छह सांसद एक साथ पार्टी छोड़ते हैं, तो वे दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों से बच सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।