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एक महिला के सिवा कोई नहीं इस गांव में

Sat, 14 Sep 2013 11:59 PM IST
अमर उजाला, जगमोहन सिंह रावत, दुगड्डा
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किसी समय इंसानों की चहलकदमी और अनाज से भरे खेतों के बीच रहने बसने वाला छोटा सा गांव आज वीरान पड़ा हुआ है। मानव विहीन हो चुके कोटद्वार के सिरसुल गांव को एक बुजुर्ग महिला दिकंबरी देवी ने जीवित रखा है।
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वह इस गांव में न सिर्फ अकेले रहती है, बल्कि जितना हो सके खेतों में भी काम करती है। विकास खंड दुगड्डा के अंतर्गत ब्लाक मुख्यालय से तीन किमी दूरी पर स्थित सिरसूल गांव पूरी तरह से आबादी विहीन हो चुका है।

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घरों में ताले लटके हुए
किसी समय इस गांव में करीब 12 परिवार रहा करते थे। विकास की किरण की आस और सुख सुविधाओं के पीछे भागते हुए नई पीढ़ी के लोगों का गांव से पलायन होता गया। आज स्थिति यह है सभी के घरों में ताले लटके हुए हैं।
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गांव में डटी हैं दिकंबरी
गांव के सभी परिवार बाहर बस चुके हैं। लेकिन 75 वर्षीय दिकंबरी देवी उसी गांव में डटी हैं। उसके दो लड़के कोटद्वार में रहते हैं। लेकिन दिकंबरी देवी का कहना है कि उसको शहर की जिंदगी अच्छी नहीं लगती है।

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आठ साल पहले पति ओमप्रकाश चौधरी का निधन होने के बाद से वह गांव में अकेली रहती हैं। अस्वस्थ होने पर वह लड़कों के पास चली जाती हैं लेकिन कुछ दिन रहने के बाद वापस गांव में आकर अपनी खेती बाड़ी के काम में जुट जाती है।

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गाय भी पाल रखी
उसने एक गाय भी पाल रखी है। वह बताती हैं कि किसी समय इस गांव में भरपूर खेती होती थी। एक परिवार में 10 कि्वंटल धान, दलहन, मंडवा, झंगोरा और गेहूं अत्यधिक मात्रा में होते थे।

मेरे सामने एक-एक करके गांव के खेत बंजर होते गए और आज इन खेतों में जंगल बना हुआ है।

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वन अधिनियम ने रोकी थी गांव की सड़क
इस गांव में काफी साल पहले सड़क बनने के लिए योजना बनी थी। लेकिन घने जंगल के बीच बसे इस गांव में सड़क बनने के लिए वन कानून आड़े आ गया और योजना आगे नहीं बढ़ पाई। उसके बाद यातायात के अभाव में भी कुछ लोग गांव छोड़कर चले गए।

मकानों के बंद किवाड़ बयां कर रहे कहानी
गांव में सभी भवन बड़े और आलीशान हुआ करते थे। लेकिन आज सभी के दरवाजे बंद हैं और उन पर ताले लटके पड़े हैं।

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वीरान पड़े यह भवन गांव में पलायन के दर्द की कहानी को निशब्द बयां कर रहे हैं। सुविधाओं के पीछे दौड़ते हुए गांव से दूर जाने वालों के लिए भी दिकंबरी देवी मिसाल बनकर गांव में डटी हुई है।
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