इस बार जंगल को जितना अधिक नुकसान हुआ, उतना उत्तराखंड में कभी नहीं हुआ। 121.5 हेक्टेयर वन आग की चपेट में आए हैं। वन विभाग से लेकर प्रशासन तक पूरा सिस्टम बेबस, ग्रामीणों से सहयोग की अपील की। मगर सहयोग लेने की पहल ढीलीढाली रहने से इस बार नागरिकों में भी उत्साह कम था।
चंपावत डिवीजन में 119290 हेक्टेयर जंगल में से 34377 हेक्टेयर (28.81 प्रतिशत) पंचायती जंगल है। 738 वन पंचायतें हैं, लेकिन अग्नि सुरक्षा समिति की बैठकें 10 प्रतिशत वन पंचायतों में भी नहीं हुई। पंचायतों और ग्रामीणों को प्रेरित करने के लिए विभागीय पहल महज औपचारिकता भर रही।
सरपंच संगठन का कहना है कि जंगलात के बड़े अधिकारी तो दूर, बीट स्तर के अधिकारी-कर्मचारी भी वन पंचायतों को ज्यादा भाव नहीं देते हैं। आग से बचाव के लिए वन पंचायतें चौकीदार और दूसरे कर्मचारी की तैनाती तक नहीं कर पाती है।
वन संपदा पहाड़ की आभूषण हैं। मगर सिस्टम की लापरवाही से जंगलों को बचा पाने की हमारी सामूहिकता मंद पड़ गई। जंगलों को बचाने में वन पंचायतें और ग्रामीण भरपूर सहयोग करते थे, लेकिन वन महकमे द्वारा लगातार वन पंचायतों की उपेक्षा से यह सक्रियता कम हुई है। जंगलात को बेहतर तालमेल कर लोगों को प्रेरित करना चाहिए।
- दीपक बोहरा, पूर्व सचिव, वन पंचायत सरपंच
जंगल की आग पर अब पूरी तरह से काबू पा लिया गया है। आम नागरिकों से सहयोग लेने के लिए वन विभाग के साथ मिलकर प्रयास किया जाएगा। वन पंचायतें अपने स्तर से जंगलों को सुरक्षित रखने के लिए हर कदम उठाने को स्वतंत्र हैं।
- दीपेंद्र कुमार चौधरी, डीएम, चंपावत
अब तक आग की 53 घटनाएं दर्ज
फायर सीजन खत्म होने में अभी करीब छह सप्ताह का वक्त है, लेकिन इस बार की जंगल की आग ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ डाले हैं। 15 फरवरी से तीन मई तक चंपावत में 121.5 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आ गए हैं। ये आंकड़ा उत्तराखंड बनने के बाद का सबसे विकराल है। इससे पूर्व 2009 में 71 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आया था। वन विभाग के मुताबिक इस फायर सीजन में अब तक दावाग्नि की 53 वारदात हो चुकी हैं। जिसमें 121.5 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ है।
24 घंटे में दावाग्नि की एक भी घटना दर्ज नहीं
बीते 24 घंटे में आग की एक भी घटना सामने नहीं आई। सोमवार से अब तक जंगल के धधकने की एक भी सूचना वन विभाग के किसी भी नियंत्रण कक्ष में नहीं है। विभाग ने 53 क्रू स्टेशन, 7 वॉच टावर बनाए हैं।