आंखों में अपनों को खो देने का दर्द और आंसुओं का सैलाब लिए वह बेहद धीमी आवाज में पहली दफा इतना भर ही कह पाई कि मैं और मेरी छोटी बहन अब किसके सहारे रहेंगे। जिनकी गोद में उसने अपनी आंखों को खोलकर दुनिया को समझने की कोशिस की थी और जिनके हाथों ने उसकी नंही ऊंगलियों को पकड़कर कदम बढ़ाना सिखाया था आज वही कहीं गुम हो गए हैं।
ग्वालियर, मध्यप्रदेश की स्नेहलता शर्मा का पूरा परिवार केदारनाथ मार्ग से लापता है। वह अपनी छोटी बहन के साथ अकेली रह गई हैं। दो दिन से भूखी प्यासी ऋषिकेश बस अड्डे स्थित परमार्थ कैंप में गुमसुम बैठी स्नेहलता से परिवार के बारे में पूछा तो वह फफक पड़ी।
किसी तरह उसने अपने पर काबू किया और बोली, मेरे माता-पिता, भाई-बहन सब लापता हैं, एक छोटी बहन के अलावा मेरा कोई नहीं रह गया। इतना कहने से शायद उसके जेहन में फिर से परिवार के साथ बिताए हुए पल ताजा हो गए और वह खामोश अपनी निगाहों को इधर-उधर घुमाने लगी। स्नेहलता भयभीत है, लेकिन एक उम्मीद ही है जो उसका हौसला बढाए हुए है।
वह शनिवार को ग्वालियर से शांतिकुंज स्थित मध्यप्रदेश सरकार के आपदा राहत कैंप से अपने परिजनों को ढूंढने ऋषिकेश बस अड्डा पहुंची। स्नेहलता ने बताया कि पिता सुरेश शर्मा, माता लक्ष्मी शर्मा, बहन काजल, ज्योति, भाई राहुल और समीर ऋषिकेश से चारधाम यात्रा पर निकले थे।
थोडी देर की मायूसी से फिर वह एकाएक बोल पड़ी कि उसके परिजनों ने यमुनोत्री और गंगोत्री के दर्शन कर लिए थे, इसके बाद वे 15 जून को गौरीकुंड से केदारनाथ के रास्ते पर थे, तभी उनसे आखिरी बार बात हुई थी। इसके बाद से वह लापता हैं। उनका कहीं कुछ पता नहीं चल रहा।
उत्तराखंड आपदा की पल-पल अपडेट होती खबरों के लिए यहां क्लिक करें
बहन को घर पर ही छोड़ा
स्नेहलता ने बताया कि उनके पिताजी हर साल चारधाम यात्रा पर जाते हैं। वह बीते साल मुझे और मेरी बहन काजल को साथ ले गए थे। तब उन्हें किसी प्रकार की दिक्कत नहीं हुई थी। साथ ही बताया कि वह इस बार किसी परीक्षा की तैयारी कर रही थी, लिहाजा यात्रा पर नहीं जा पाई। उसने अपने साथ छोटी बहन काजल को रोक लिया। अब बहन को नौकरानी के भरोसे छोड़कर आई हैं। बोली, अगर उनके परिवार को कुछ हो गया, तो वे किसके सहारे रहेंगी।
स्नेहलता का दर्द वाजिब भी है और भयावह भी। स्नेहलता की ही तरह परमार्थ कैंप में अपनों को तलाशने के लिए देशभर से अभी भी कई लोग जुटे हुए हैं, जिनकी उम्मीदें दिन ब दिन दम तोड़ती जा रही हैं। कुछेक आंसुओं का सैलाब लिए लौट चुके हैं और कुछेक अपनी आंखो से अंतिम दफा ही सही अपने परिजनों को देख भर लेना चाहते हैं।