प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद कांग्रेस के सामने दो विकल्प बचे हैं। पहला यह कि प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के मामले को उच्चतम न्यायालय में ले जाए और दूसरा यह कि सीधे चुनावी मैदान में उतरे। कांग्रेस ने इस पर विचार मंथन शुरू कर दिया है।
कांग्रेसियों का मानना है कि प्रदेश सरकार के कार्यकाल को छह-आठ महीना बचे थे, ऐसे में अगर उच्चतम न्यायालय से कोई राहत मिलती भी है तो कुछ दिन के बाद चुनाव हो जाएंगे। सीधे जनता की अदालत में जाने से रावत सरकार लोगों की संवेदनाओं को अपने पक्ष में भुना सकती है।
प्रदेश में राजनीतिक संकट पैदा होने के बाद कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को चुनावी मोड में कर दिया था। कुछ कांग्रेसियों का मत है कि राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद कांग्रेस उच्चतम न्यायालय जाने के बजाए चुनावी मैदान में जा सकती है। चुनावी तैयारियों के साथ उच्चतम न्यायालय में भी इस मामले को ले जाया जा सकता है।
हाल ही में हुए चुनाव तो कांग्रेस को हो सकता है फायदा
कांग्रेसी पदाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में विकास कार्य शुरू होने वाले थे, मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर अमल का सिलसिला शुरू हुआ था, ऐसे में भाजपा की साजिश से सरकार गिर गई। कांग्रेस मतदाताओं में इन मुद्दों को उठाकर संवेदना पैदा कर सकती है।
राष्ट्रपति शासन लागू होते ही कांग्रेस ने अपनी रणनीति को लेकर नफा-नुकसान का आकलन शुरू कर दिया है। अगर हाल में ही चुनाव हो गए तो कांग्रेस को इसका फायदा मिल सकता है और भाजपा को नुकसान। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट जाने के बजाए सीधे जनता की अदालत में यह मामला ले जाया जाए।
हमारे से पास न्यायिक विकल्प भी हैं। लेकिन, मैं जनता के बीच जाना ज्यादा पसंद करूं गा। उत्तराखंड के लोगों को बताऊंगा कि मोदी ने सरकार की हत्या इसलिए करवाई कि इसका मुख्यमंत्री गांव की, गरीब की बात कर रहा था। -हरीश रावत, मुख्यमंत्री
सारे विकल्प खुले हुए हैं। बातचीत के बाद न्यायालय भी जा सकते हैं। सबसे बड़ी अदालत तो जनता की है, वही फैसला करेगी।
-किशोर उपाध्याय, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष।