विश्व विख्यात पर्यटन नगरी में 100 साल पुराने दो अस्पताल वेंटिलेटर पर चले गए। इन अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं आज की अपेक्षा पिछली सदी में ज्यादा बेहतर थीं। ब्रिटिश शासन काल में बने सेंट मेरी और सिविल अस्पताल में आजादी के वर्षों बाद तक व्यवस्थाएं दुरुस्त रहीं, लेकिन महकमे की उदासीनता के कारण अब दोनों अस्पतालों में स्टाफ और सुविधाओं का टोटा है।
1917 में बने सिविल अस्पताल (तत्कालिक न्यू डिस्पेंसरी इन मसूरी) को 2009 में संयुक्त चिकित्सालय बनाने के लिए तोड़ दिया गया। इसके स्थान पर करीब साढ़े तीन करोड़ की लागत से 51 बेड का अस्पताल बनकर तैयार किया जाना था। लेकिन, सात साल बीत जाने के बाद भवन निर्माण तक पूरा नहीं हो सका।
टीबी के ईलाज को देशभर में मशहूर था अस्पताल
वहीं 1903-04 में बने सेंट मेरी अस्पताल का भवन भी जर्जर हो चुका है। अस्पताल इन दिनों चिकित्सकों और सहयोगी स्टाफ की कमी से भी जूझ रहा है। जबकि, अस्पताल अपने निर्माण काल से आजादी के कई वर्षों बाद तक सेनीटोरियम यानी टीबी के ईलाज के लिए देशभर में मशहूर था।
एक सदी पहले इन अस्पतालों में एक्सरे-मशीन, इलैक्ट्रिक्स लाइट बाथस, रेडियोथैरेपी, हाईड्रोथैरपी समेत अन्य चिकित्सीय सुविधाएं मौजूद थी, लेकिन अब हालात यह है कि इनमें ओपीडी तक बेहतर ढंग से संचालित नहीं होती।
मसूरी में मौजूदा समय में दो सरकारी अस्पताल हैं। यहां सैलानियों की आमद के साथ ही स्थायी जनसंख्या और जौनपुर प्रखंड के हजारों मरीज इन दो अस्पताल के भरोसे हैं। लेकिन, दोनों ही अस्पताल चिकित्सीय सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। राजकीय सेंटमेरी अस्पताल मे बेड है, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों और पैरा मेडिकल स्टाफ की भारी कमी है।
चिकित्सकों के छह पद खाली
सिविल अस्पताल में वर्तमान चिकित्सा अधीक्षक समेत चिकित्सकों के छह पद हैं। जिनमें दो ही कार्यरत है। पैरा मेडिकल स्टाफ में एक फार्मासिस्ट और स्टाफ नर्स के पांच पदों से एक ही तैनात है। तीन का अटैचमेंट चल रहा है।
कमोवेश यही स्थित सेंटमेरी अस्पताल की भी है। सेंटमेरी में अधीक्षक समेत छह पद हैं। जिनमें दो ही कार्यरत है। यहां पर भी पैैरा मेडिकल और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भारी कमी है।