उत्तराखंड में इंसानी जानों पर प्रशासनिक तंत्र हावी है। तभी तो बजट का रोना रोकर शासन करीब तीन साल से ‘विक्टिम इमेजिंग(थर्मल इमेजिंग) कैमरे’ की खरीद का प्रस्ताव टालता आ रहा है।
ये कैमरे अगर खरीद लिये गये होते तो शायद आपदा में कई और जानें बचाई जा सकती थीं। इसकी मदद से अंधेरे में, घने कोहरे या धुंध में और मलबे में फंसे जिंदा लोगों को खोजा जा सकता है, जो इस वक्त सरकार और सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
ऐसे में लोकेशन पता लगते ही उन्हें बचाया जा सकता है। राज्य में इस वक्त आई भयंकर आपदा में ये मशीन मानवीय कार्यक्षमता को और बढ़ा सकती थी। शासन में बजट की बात कह इस उपकरण की खरीद का प्रस्ताव लगातार टाला जा रहा है।
करीब तीन साल पहले अग्निशमन विभाग की ओर से शासन को इस उपकरण की खरीद का प्रस्ताव भेजा गया था। जिसमें कहा गया था कि आग और प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए ये उपकरण बेहद कारगर है।
यह उपकरण भीषण आग के चलते पैदा हुए धुएं, अंधेरे और प्राकृतिक आपदा के कारण मलबे में दबे लोगों को उनकी सांसों की गर्मी और कंपन से पहचान सकता है। ऐसे में उन्हें बचाना काफी आसान हो जाता है।
उत्तराखंड जैसे प्रदेश के लिए तो ये उपकरण और भी अहम साबित हो सकता था। देश भर में अभी तक सिर्फ एक या दो राज्यों में ही इस उपकरण का इस्तेमाल हो रहा है।
करीब 20 लाख है कीमत
विक्टिम इमेजिंग कैमरे की कीमत करीब 20 लाख रुपये है जबकि ये साइज में एक छोटे वीडियो कैमरा या हैंडीकैम की तरह है। जिसे रखने या आपदा ग्रस्त जगहों पर ले जाने में काफी आसानी होती है।
इसमें इंफ्रारेड सहित कई रेज पैनल, एक डिसप्ले और एक इलेक्ट्रानिक डिटेक्टर लगा होता है। इनकी मदद से यह जिंदा इंसान की लोकेशन बताता है।
कई बार भेजा प्रस्ताव
पुलिस मुख्यालय के माध्यम से कई बार कैमरे का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है। लेकिन शासन की ओर से इसकी खरीद के लिए बजट की कमी बताई जाती है। चंदन सिंह जीना, मुख्य अग्निशमन अधिकारी, पुलिस मुख्यालय